कानून व्यवस्था की अनदेखी जितना हमारे देश में होती है लगभग उतनी ही दिक्कतें बाकी दूसरे देशों में भी हैं। इन व्यवस्थाओं को ध्यान में रखकर एक दिन विश्व न्याय दिवस के रूप में भी चुना गया है। फिल्में समाज का आईना होती हैं। इसलिए, समाज में कानून के साथ होने वाले खिलवाड़ पर भी हिंदी सिनेमा में एक से एक बेहतरीन फिल्में बनाई गई हैं। हमारे देश में ऐसी फिल्मों की शुरुआत तो 1960 में आई फिल्म 'कानून' से हुई थी है लेकिन तब से लेकर अब तक लगातार लचर कानून व्यवस्था पर फिल्में बनाई जा रही हैं। आज हम आपको कानून को अंधा बताने वाली कुछ ऐसी ही फिल्मों के बारे में बताएंगे।
इन 10 फिल्मों ने साबित किया कानून को अंधा, बताया किस तरह हवा होता है न्याय
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कानून (1960)
क्योंकि कोर्टरूम ड्रामा जॉनर ही हिंदी सिनेमा में इसी फिल्म से शुरू हुआ तो सबसे पहले इसी फिल्म को जानते हैं। बी आर चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में राजेंद्र कुमार, अशोक कुमार, नंदा, महमूद आदि कलाकार मुख्य भूमिकाओं में थे। राजेंद्र कुमार ने इस फिल्म में एक वकील का किरदार निभाया जो एक निर्दोष व्यक्ति को बचाने की पैरवी करते हैं। इस केस की सुनवाई जज के रूप में अशोक कुमार का किरदार कर रहा होता है जो कि खुद ही अपराधी है। इस फिल्म में सीधे तौर पर दिखाया गया है कि किस तरह झूठे सबूतों और गवाहों की बुनियाद पर किसी निर्दोष को फांसी के फंदे तक पहुंचाया जा सकता है। इस फिल्म की एक और खास बात यह रही कि यह हिंदी सिनेमा की पहली बिना गीत वाली फिल्म है।
बात एक रात की (1962)
शंकर मुखर्जी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में देव आनंद, वहीदा रहमान और जॉनी वॉकर मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। फिल्म में देव आनंद ने एक वकील राजेश्वर का किरदार निभाया है। वहीदा रहमान कहानी में एक ऐसी हत्या की दोषी हैं जो उन्होंने नहीं की है। नीला के किरदार में हालांकि फिर भी वह अपने गुनाहों को कुबूल कर लेती हैं। जब राजेश्वर अपने तरीके से इस केस की तह तक जाता है तो उसे पता चलता है कि यह काम नीला ने नहीं किया है। बाद में वह सीआईडी की मदद से इस केस का पूरा पर्दाफाश करता है और नीला को सजा मिलने से बचाता है।
मेरी जंग (1985)
अनिल कपूर, मीनाक्षी शेषाद्री, नूतन, अमरीश पुरी, परीक्षित साहनी जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म कोर्टरूम ड्रामा जॉनर की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक है। फिल्म की कहानी में एक खुशहाल परिवार है जिसमें मां बाप के साथ एक बेटा और बेटी रहते हैं। अचानक से उनकी जिंदगी में तूफान आ जाता है जब जीडी ठकराल नाम का नामचीन वकील अरुण के पिता दीपक वर्मा को झूठे केस में फंसाकर सजा दिलवाने की कोशिश करता है। फिल्म में अरुण का किरदार अनिल कपूर ने निभाया है। वह अपने पिता को बचाने के लिए खुद वकील का कोट पहनता है और अपने पिता का केस लड़ता है। अंत में वह अपने पिता को बेगुनाह साबित करता है। सुभाष घई की इस सुपरहिट फिल्म में भी कानून का गलत फायदा उठाने वालों को उजागर किया गया है।
दामिनी (1993)
इस फिल्म में दामिनी का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्री को अंधे कानून के खिलाफ आवाज उठाते हुए देखा गया है। कहानी में दामिनी अपने पति शेखर गुप्ता के भाई राकेश को एक दिन अपने घर की नौकरानी का बलात्कार करते हुए देखती है। इस घटना को देखने के बाद वह चुप नहीं बैठती और तमाम परेशानियां झेलने के बावजूद वह अपने पति शेखर और एक वकील गोविंद के साथ मिलकर उसे न्याय दिलवाती है। इस फिल्म में मीनाक्षी के पति का किरदार ऋषि कपूर ने निभाया है और वकील के किरदार में सनी देओल नजर आए हैं। इस फिल्म में सनी देओल का बोला हुआ संवाद 'तारीख पर तारीख' आज भी बहुत मशहूर है। इन तीनों के अलावा फिल्म में अमरीश पुरी भी मुख्य भूमिका में हैं।