भारत में थिएटर से ज्यादा हिंदी सिनेमा को महत्व दिया जाता है। फिल्मों में भले ही अभिनेता अपने किरदार को जीवंत करने के लिए कड़ी मेहनत करता है, लेकिन थिएटर में अभिनेताओं का लाइव परफॉर्मेंस देखने का मजा ही कुछ और होता है। कैमरे के सामने कोई भी रीटेक लेकर अपने प्रदर्शन में सुधार ला सकता है, लेकिन जब आप मंच पर होते हैं, तो आपको यह सुनिश्चित करना होता है कि आप एक बार में अपना सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस दें। आज भले ही रंगमंच भारत में उतना लोकप्रिय नहीं हो, लेकिन हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनाने वाले दिग्गज कलाकार आज भी अपने अभिनय कौशल में सुधार लाने के लिए नुक्कड़ नाटक करते हैं।
Theatre Day: थिएटर कलाकारों ने बड़े पर्दे पर बनाई अमिट पहचान, कौशल की परीक्षा लेने आज भी करते हैं रंगमंच का रुख
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शाहरुख खान
बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान, रोमांस किंग बनने से पहले थिएटर का हिस्सा रह चुके हैं। उन्होंने 'बैरी जॉन' के तहत थिएटर का अध्ययन किया और टीवी शो 'फौजी' से छोटे पर्दे पर डेब्यू करने से पहले एक थिएटर ग्रुप में काम किया है। शाहरुख खान ने एक साक्षात्कार के दौरान बताया था कि बैरी जॉन की वजह से ही आज वह इस मुकाम पर हैं। 'किंग खान' यह भी कहते हैं कि थिएटर के कारण, उन्होंने दृढ़ता और विश्वास जैसे कौशल सीखे और कभी हार न मानने वाला रवैया अपनाया है।
मनोज बाजपेयी
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में सरदार खान के रूप में नजर आने वाला शख्स भी थिएटर का आदमी है। कथित तौर पर, वह बचपन से ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में शामिल होना चाहते थे। हालांकि उन्हें कई बार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। अपने स्नातक स्तर की पढ़ाई के दौरान मनोज बाजपेयी ने कई नुक्कड़ नाटकों में परफॉर्म किया और नतीजतन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने उन्हें शिक्षक बनने का ऑफर दिया था। बता दें कि उन्हें बैरी जॉन के तहत प्रशिक्षित भी किया गया था।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी
"भगवान को मानते हो साहब" का डायलॉग हमें गणेश गायतोंडे का चेहरा याद दिलाता है। नेटफ्लिक्स की हिट वेब सीरीज में मशहूर डॉन का किरदार निभाने वाले स्टार कोई और नहीं बल्कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी थे। वह भी थिएटर से आए हैं। वह एक रसायनज्ञ थे, जब तक कि उन्हें अभिनय के लिए अपने जुनून के बारे में पता नहीं चला था। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक थिएटर कलाकार के रूप में शुरुआत की और दिल्ली चले जाने के बाद, उन्होंने कई नाटकों में काम किया, जो अंततः उन्हें बॉलीवुड तक ले गए। वहां से वे मुंबई चले गए और 12 साल के संघर्ष के बाद, वह हिंदी फिल्मों की दुनिया के शीर्ष अभिनेताओं में से एक बन गए हैं।
ओम पुरी
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता (अर्ध सत्य के लिए) ओम पुरी ने 'धारावी', 'मिर्च मसाला', 'मकबूल' और 'माचिस' जैसी फिल्मों में कई करियर परिभाषित करने वाली भूमिकाएं निभाईं हैं। लेकिन भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII) और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) से स्नातक करने वाले दिवंगत अभिनेता ओम पुरी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत थिएटर से की थी।