अपना अड्डा’ सीरीज की आज की कड़ी उस कलाकार के नाम है, जिसने अपना नाम ही लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास जैसा रख लिया। अमेरिका में अच्छी खासी आईटी की नौकरी छोड़ मुंबई गीत लिखने आए प्रयागराज के कुमार अतुल की अपनी कहानी भी कम फिल्मी नहीं है। फिल्म नगरी में उनके बीते चार साल कैसे रहे, कुमार बता रहे हैं ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल को।
Apna Adda 24: गीतकार बनने के लिए छोड़ आए अमेरिका में आईटी की नौकरी, कुमार विश्वास की तरह का रखा नाम
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आपकी पढ़ाई-लिखाई और नौकरी सब अतुल कुमार वर्मा के नाम से हुई? ये कुमार अतुल आप कब और कैसे बन गए?
जी हां, मेरा पूरा नाम अतुल कुमार वर्मा ही है, लेकिन मनोरंजन जगत में मैं कुमार अतुल के नाम से लंबे अरसे से सक्रिय हूं। ये नाम मैंने विश्वास कुमार शर्मा के लोकप्रिय नाम कुमार विश्वास से प्रेरित होकर रखा। इलाहाबाद (प्रयागराज) का करने वाला हूं और यहां की तो मिट्टी, पानी और हवा सब में ही विश्वास है। मेरा भी विश्वास रहा कि मैं गीत लिख सकता हूं सो आईटी की नौकरी छोड़ बन गया गीतकार।
पिता टेलीकम्यूनिकेशन इंजीनियर, भाई आईएफएस और हाईकोर्ट के वकील, आपकी भी अच्छी खासी नौकरी तो चल ही रही थी, फिर ये सिनेमा कैसे..?
ये थोड़ी लंबी कहानी है, लेकिन संक्षेप में सुनाता हूं। मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद रिलायंस के मोबाइल फोन और दिल्ली दरबार के फूड कूपन घर घर जाकर बेचे हैं। पहली नौकरी कॉल सेंटर की लगी और फिर कही जाकर बंगलुरू में आईटी कंपनी का दरवाजा देखा। उसके बाद लंदन, सिंगापुर, कनाडा और अमेरिका सब हो आया, लेकिन मेरा मन शायद लेखन और संगीत में ही अटका रहा। चार साल पहले ही मैंने अपना नाम बदला और रचनात्मक मोक्ष की मायानगरी मुंबई आ गया।
ये तो बड़ा फैसला रहा। यहां तक पहुंचने के पड़ाव अब तक क्या क्या रहे?
इसकी शुरुआत वैसे तो बचपन में ही कह सकते हैं कि कविताएं आदि लिखने से हो गई थी। पत्र-पत्रिकाओं में छपने भी लगा था। लेकिन, असल मोड़ आया जब मुझे शिकागो में कई कवि सम्मेलनों, मुशायरो और म्यूजिकल शोज का सूत्रधार बनने का मौका मिला। आतिफ असलम, नेहा कक्कड़ और प्रीतम का सानिध्य मिला और कदम इधर को चल पड़े। कुमार विश्वास, जावेद अख्तर, गुलजार, साहिर लुधियानवी, राहत इंदौरी, अहमद फराज और फैज की रचनाओं का मैं कायल रहा हूं। ये ही मेरी पाठशाला हैं।
तो वो दिन याद है जब पहली बार मुंबई आए थे?
हां, अच्छी तरह याद है लेकिन ये हमारी पहली पारी का किस्सा है जब हम भी कुमार विश्वास की कविता ‘कोई दीवाना कहता है’ के मुख्य पात्र बने थे। बात साल 2003 की है। याहू मैसेंजर ने तब युवाओं के बीच गदर काट रखा था और वहीं प्राइवेट चैट करते करते हमें मुंबई की एक बाला से ई-इश्क हो गया। उसने बताया वसई और हम पहुंच गए वाशी। तीन दिन तक ढूंढा। इस बीच पर्स भी चोरी हो गया। चौथे दिन मोहतरमा जब मिलीं तब तक हमारा हुलिया बदल चुका था। वो मिली नहीं और अब भी ‘ब्रेकअप’ मनाते हुए अपने शहर से आए हीरो अमिताभ बच्चन के बंगले की तरफ निकल लिए। वहां गार्ड ने ही हड़काकर भगा दिया।