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Vicky Kaushal Interview: उस दिन हम एक छत के नीचे थे, कहां पता था कि हमें किसी दिन एक छत के नीचे एक साथ रहना है

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Mon, 22 Jul 2024 06:58 PM IST
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Vicky Kaushal Exclusive Interview with Pankaj Shukla bad newz katrina kaif masaan new York gangs of wasseypur
विक्की कौशल - फोटो : अमर उजाला

साल 2012 में जब स्टंट निर्देशक शाम कौशल का बड़ा बेटा विक्की फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के सेट पर भागदौड़ कर रहा होता था, तब सलमान खान की फिल्म ‘एक था टाइगर’ तक आते आते कैटरीना कैफ सुपरस्टार बन चुकी थीं। इसके बाद फिल्म ‘मसान’ में एक दलित युवक के किरदार से विक्की कौशल भी हीरो बने। ‘उरी’, ‘सरदार उधम’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी फिल्मों से विक्की कौशल फिल्म दर फिल्म निखरते जा रहे हैं। उनकी हालिया रिलीज फिल्म ‘बैड न्यूज’ उनकी अब तक की सबसे अच्छी ओपनिंग लेने वाली फिल्म है। ‘अमर उजाला’ के लिए उनसे ये खास मुलाकात की सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।

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बैड न्यूज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कॉमेडी फिल्म करते समय कलाकारों को खुद पर कितना काबू रखना होता है?
कॉमेडी फिल्मों का ये बहुत ही संवेदनशील पहलू है। कई बार कलाकार खुद ही इतना खो जाते हैं किरदार में कि दर्शकों तक उनका रस पहुंच ही नहीं पाता है। ऐसे मौकों पर ये याद रखना बहुत जरूरी है कि ये फिल्म दर्शकों को हंसाने के लिए है, खुद के मजे लेने के लिए नहीं। फिल्म ‘बैड न्यूज’ के निर्देशक आनंद तिवारी ने भी हमें यहीं समझाया कि ये आपके लिए मजाकिया स्थिति नहीं है। आप जितना परेशान होंगे हालात से, दर्शकों को लिए ये उतनी ही अच्छी कॉमेडी बनती जाएगी।

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गोविंदा नाम मेरा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, ‘गोविंदा नाम मेरा’ जैसी अपनी पिछली कॉमेडी फिल्मों के कुछ सबक काम आए आपको इस फिल्म में?
कॉमेडी सिनेमा की एक ऐसी श्रेणी है जिसमें से मैं हर बार कुछ नया सीखता हूं और हर बार अपनी फिल्म में कुछ बेहतर करता हूं। व्यक्तिगत पसंद के तौर पर पूछें तो भावुक और नाटकीय दृश्य करने में मुझे बहुत आनंद आता है। उनके एहसास में मैं घुस जाता हूं। लेकिन, कॉमेडी करते समय थोड़ा दबाव तो रहता है कि दर्शकों को हंसाना है, उन्हें खुश करना है। ऐसे में मैं गोविंदा, अक्षय कुमार और दिलजीत दोसांझ जैसे लोगों से प्रेरणा लेता हूं जिनकी अदाकारी अपने अलग प्रवाह में रहती है, वे किसी की परवाह नहीं करते।

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बैड न्यूज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, घटनाओं से बनने वाला हास्य जिसे सिनेमा में सिचुएशनल कॉमेडी कहते हैं, ये कितना कठिन या आसान है, स्लैपस्टिक या कहें कि दूसरों की हंसी उड़ाकर बनने वाले हास्य से?

सिचुएशनल कॉमेडी ज्यादा मुश्किल है। इसमें जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात होती है वह है इसका लेखन। क्योंकि, परदे पर दर्शकों के लिए हास्य की स्थिति बन रही है, लेकिन जिन किरदारों के साथ वह सब हो रहा है, वे सब उस वक्त देखा जाए तो काफी गंभीर स्थिति से गुजर रहे होते हैं। फिल्म ‘बैड न्यूज’ के भी सारे गैग्स, सारे चुटकुले पहले से लिखे हुए थे। हमने कुछ भी शूटिंग करते हुए नहीं बनाया है।

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विक्की कौशल (छावा) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

‘बैड न्यूज’ की शूटिंग खत्म करने के बाद आपने ‘छावा’ की और अब फिर से उसी लुक में हैं। एक बार में एक फिल्म के लिए एक लुक रखना किरदारों को निभाने में कितनी मदद करता है?

मेरे लिए ये बहुत काम करता है। मुझे ऐसा लगता है कि मैं और सच्चाई से इसके चलते अभिनय की प्रक्रिया में घुस पाता हूं और बहुत फोकस के साथ घुसता हूं। बीती सदी में फिल्मों की शूटिंग दिन में 12 घंटे करने निकले कलाकार अलग अलग निर्माताओं को तीन-तीन घंटे बांट देते थे। अब अगर आपने किसी फिल्म के लिए हां की है तो आपको पूरा समय उस फिल्म को देना ही होगा। ऐसे में एक तयशुदा लुक बहुत मदद करता है क्योंकि उस लुक में आप दूसरी फिल्म कर ही नहीं सकते। आज बड़े से बड़े कलाकार पर ये व्यवस्था लागू होती है।

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