Movie Review: लाल कप्तान
नवदीप सिंह की बतौर निर्देशक पहली फिल्म मनोरमा सिक्स फीट अंडर जिन लोगों ने भी देखी है, सब उन्हें एक नए नजरिए वाला फिल्म निर्देशक मानते रहे हैं। अनुष्का शर्मा के करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक एनएच 10 भी उन्होंने बनाई। एक अच्छे निर्देशक को हिंदी सिनेमा का स्टारडम भ्रष्ट करता है और एक अच्छे निर्माता को बेड़ा सतही तौर पर अलहदा दिखने वाली फिल्में बीच समंदर में डुबो देती हैं। और, सेक्रेड गेम्स जैसी सीरीज? इस पर बात थोड़ा रुककर, पहले लाल कप्तान के रंग देख लेते हैं।
गोसाईं की जिंदगी निराली है। शिव का पुजारी है। शव तांडव में उसे आनंद आता है। कोई दो सौ साल पहले के भारत में भटकता गोसाईं का निशाना रहमत खान है। यहां मंजिल तक पहुंचने के पड़ाव नहीं हैं। हर अल्पविराम किसी काम के पूर्ण होने की कहानी कहता है और एक दंभी रानी और एक मसखरे साथी के बीच से होकर ये कहानी आपका भेजा फ्राई करने में कामयाब रहती है। मनोरंजन की उम्मीद से सिनेमाघर में पहुंचे दर्शक को लगता है कि अब नहीं तो तब कहानी में कुछ ऐसा आएगा, जिसे वह फिल्म खत्म होने के बाद अपनी यादों में साथ लेकर जाएगा। लेकिन, बटुए की कमाई बॉक्स ऑफिस पर लुटा आया ये आम आदमी आखिर में ईरॉस कंपनी की घटती अंतर्राष्ट्रीय साख सा ठगा महसूस करता है।
Laal Kaptaan Review: क्या हैं लाल कप्तान की 5 कमजोर कड़ियां
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कहानी और निर्देशन में गोता लगाने के अलावा फिल्म लाल कप्तान अदाकारी के मामले में भी खूब हिचकोले खाती है। अंधाधुन में आशिक मिजाज पुलिस अफसर के किरदार में खूब वाहवाही पाने वाले मानव विज के किरदार को यहां लेखक की गाढ़ी स्याही की जरूरत थी, पर उनका किरदार रोमन में लिखी हिंदी जैसा एहसास ही दे पाता है। सिमोन अरसे बाद बड़े परदे पर दिखीं पर बेअसर रहीं। हां, दीपक डोबरियाल का मनमौजी रूप लोगों को थोड़ी राहत जरूर देता है।
तनु वेड्स मनु, रांझणा निर्देशित करने वाले आनंद एल राय की कहानियों पर पकड़ निल बटे सन्नाटा, हैपी भाग जाएगी और शुभ मंगल सावधान तक मजबूत बनी रही लेकिन उसके बाद बतौर निर्माता उनका खाता लगातार खाली होता गया। पिछली फिल्म में वह जीरो पर आकर टिके हैं। लाल कप्तान में वहां कहां जाएंगे, इरॉस इंटरनेशनल के एकाउंटेंट ही बेहतर बता पाएंगे। बॉक्स ऑफिस की पर मुनाफे की संगत से दूर हो तुके आनंद की इस फिल्म का संगीत भी इसकी एक सबसे कमजोर कड़ी है।
लाल कप्तान हिंदी सिनेमा की उस कतार का सिनेमा है जहां निर्देशक दर्शकों को बुद्धू समझता है और खुद को विलक्षण प्रतिभावान। वह एक अलग तरह के आभामंडल को समेटे घूमता है और ये आभा मंडल ही जमीन से उसे छह फिट ऊपर उठा देता है। जब निर्देशक को कभी कभी लगने लगे कि अपुन ही भगवान है तो फिर हश्र सेक्रेड गेम्स के दूसरे सीजन जैसा ही होता है। सैफ अली खान का बचा खुचा तिलिस्म इस सीरीज ने ही खत्म किया है। न अब वह ओटीटी के सरताज रहे और न सिनेमा के सैफ। अमर उजाला के मूवी रिव्यू में फिल्म लाल कप्तान को मिलते हैं पांच में से दो स्टार।