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बाइस्कोप: कंपटीशन जीत सिर्फ इतने रुपये में कुंदन शाह ने बनाई जाने भी दो यारो, फर्स्टकट था छह घंटे का

Thu, 13 Aug 2020 01:47 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 13 Aug 2020 01:47 AM IST
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Jaane Bhi Do Yaaro this day that year series by pankaj Shukla 12 august 1983 bioscope kundan shah
जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

हिंदी सिनेमा में साल 1983 बड़े परदे पर श्रीदेवी के आगमन का साल माना जाता है। फिल्म ‘हिम्मतवाला’ में श्रीदेवी और जीतेंद्र की जोड़ी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला। आए इसी साल सनी देओल और अमृता सिंह भी थे और इसी साल मौत को हराकर वापस लौटे उस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘कुली’ भी रिलीज हुई। लेकिन, ‘कुली’ से ज्यादा कारोबार कहते हैं कि उस साल तीन बत्ती के जग्गू दादा यानी जैकी श्रॉफ की फिल्म ‘हीरो’ ने किया था। साल 1983 की और हिट फिल्मों की तलाश करेंगे तो आपको ‘अंधा कानून’, ‘मवाली’, ‘अवतार’, ‘सौतन’ और ‘अगर तुम ना होते’ जैसी फिल्में भी मिल जाएंगी। लेकिन, नहीं मिलेगी तो सिर्फ वो फिल्म जिसके बारे में आज का बाइस्कोप है यानी ‘जाने भी दो यारो’, जो जब रिलीज हुई तो हाशिये पर रही लेकिन जब सिनेमाघरों से उतर गई तो हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्म बन गई।



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Jaane Bhi Do Yaaro this day that year series by pankaj Shukla 12 august 1983 bioscope kundan shah
जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

कुंदन शाह ने लिखी थी सीक्वल
फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ के निर्देशक कुंदन शाह तब जिंदा थे, जब इस फिल्म के प्रिंट को ठीक ठाक करके फिर से इसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ को दोबारा सिनमाघरों में रिलीज हुए भी आठ साल होने को आए। कुंदन शाह से तब खूब बातें हुई थीं। उन्होंने खूब किस्से फिल्म की मेकिंग के सुनाए थे। वह ये भी कहते थे कि उनका बड़ा मन है इस फिल्म का सीक्वेल बनाने का। लेकिन, ‘एक था टाइगर’, ‘दबंग 2’ और ‘राउडी राठौर’ के एक्शन पर झूम रहे दर्शकों को साल 2012 में भी ‘जाने भी दो यारो’ का सीक्वेल भाएगा, किसी ने यकीन नहीं किया। कुंदन शाह सीक्वेल की वह स्क्रिप्ट अपने सिरहाने रखकर महीनों सोते रहे और एक दिन अपने इस सपने को लिए हुए ही ऊपर चले गए।

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Jaane Bhi Do Yaaro this day that year series by pankaj Shukla 12 august 1983 bioscope kundan shah
जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

एनएफडीसी के पैसे से बनी फिल्म
साल 2012 में ‘जाने भी दो यारो’ की फिर से रिलीज होने के वक्त कुंदन शाह के चेहरे पर बच्चों जैसी खुशी दिखाई दे रही थी। ये खुशी इस बात की थी कि मीडिया की जो चमक दमक कुंदन को साल 1983 में नसीब नहीं हुई थी, वह सब उनके सामने था। फिल्म की पहली रिलीज तो कब हुई और कब पिक्चर सिनेमाघरों से उतर गई, आधे हिंदुस्तान को तो पता भी नहीं चला और ये इसके बावजूद कि फिल्म को बनाया था राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम यानी एनफडीसी ने। सरकारी दफ्तर में काम सरकारी तरीके से ही होता हैं। हालांकि, कुंदन शाह ने इस बात पर कभी गिला नहीं किया कि उनकी फिल्म को अच्छे प्रचार प्रसार के साथ रिलीज नहीं किया गया। कुंदन का मानना था कि फिल्म अपनी पहली रिलीज में भी अपने बजट के हिसाब से अच्छा कारोबार करने में सफल रही थी। फिल्म में कोई गाना नहीं था, कोई आइटम नंबर नहीं था, हीरोइन जो थी फिल्म की वह वैम्प टाइप की थी और इसके बावजूद लोगों को ये कहानी अपनी जैसी लगी।

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जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

ईमानदार फोटोग्राफरों की कहानी
‘जाने भी दो यारो’ की कहानी थी भी उन लाखों, करोड़ों जैसी जो कुछ बन पाने की जुगत में दिन रात लगे रहते हैं। ये कहानी है एक अखबार के लिए काम करने वाले दो भोले भाले लेकिन ईमानदार फोटोग्राफरों की जिनके कैमरे में एक कत्ल कैद हो जाता है। असली कातिल को पकड़ने के चक्कर में दोनों खुद बिल्डरों के काले धंधे के दलदल में आ गिरते हैं और जितना इससे निकलने की कोशिश करते हैं, उतना ही और अंदर धसते जाते हैं। कुंदन शाह ने इन दोनो को आम आदमी का नुमाइंदा बनाकर सिस्टम मे करप्शन के कपड़े बीच चौराहे उतारने की तब कोशिश की, जब सिनेमा के दर्शक श्रीदेवी को कम कपड़ों में देखकर आहें भरने की तैयारी करने में लगे रहते थे। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ की चुस्त कथा पटकथा कुंदन शाह ने सुधीर मिश्रा के साथ मिलकर लिखी और इसके जबर्दस्त संवाद लिखने का  काम किया बाद में कैलेंडर बनकर मशहूर हुए अभिनेता निर्देशक सतीश कौशिक ने अपने जोड़ीदार रंजीत कपूर के साथ। रंजीत और सतीश अपने कमरे पर फिल्मों के किरदार बन जाते और खूब एक दूसरे से मजे लेते। और, बाद में इसी सब को कागज पर उतारकर अगले दिन कुंदन शाह को दे आते। कुंदन शाह को ये संवाद पढ़कर मजा भी खूब आता लेकिन वह चाहकर भी इन संवादों पर ठट्ठा मारकर हंस नहीं पाते थे।

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जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

कुंदन शाह ने गिनाई थीं मुश्किलें
खुद कुंदन शाह ने तब बातचीत में कहा था, ‘साल 1983 में ‘जाने भी दो यारो’  जैसी फिल्म बनाना और रिलीज करना आसान नहीं था। फिल्म के निर्देशन में मुझे बहुत दिक्कतें आईं लेकिन अब देखो तो लगता है कि किसी फिल्म का निर्देशक बन पाना ही अपने आप में किसी दिक्कत से कम नहीं है।’ ध्यान रखने वाली बात यहां ये है कि ये बात साल 2012 में वो शख्स कह रहा है जो हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक शाहरुख खान के साथ तब तक ‘कभी हां कभी ना’ बना चुका है और नसीरुद्दीन शाह को लेकर ‘खामोश’ बना चुका है। शादी के पहले ही गर्भवती हो जाने के मुद्दे पर फिल्म ‘क्या कहना’ कुंदन शाह साल 2000 में बना चुके थे। ऐसी फिल्मों का निर्देशक ऐसा क्यों कहता है कि अब निर्देशक बन पाना ही मुश्किल है, पूछने पर कुंदन ने कहा, ‘असली निर्देशक कभी सितारों की चापलूसी नहीं करेगा। चापलूस निर्देशक कभी अच्छा सिनेमा नहीं बना सकता और चापलूसी पसंद करने वाला सितारा कभी जमाने का नायक नहीं बन सकता।’

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