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Khuda Hafiz Review: मंदी के दौर में गायब हुई बीवी की तलाश और फॉर्मूले वही सारे मसाला फिल्मों के...

Sat, 15 Aug 2020 01:51 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 15 Aug 2020 01:51 AM IST
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Khuda Hafiz Review by Pankaj Shukla vidyut jammwal shivaleeka oberoi annu Kapoor faruq kabir
खुदा हाफिज - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

Movie Review: खुदा हाफिज (Khuda Hafiz)


कलाकार
: विद्युत जामवाल, शिवालिका ओबेरॉय, आहना कुमरा, शिव पंडित, नवाब शाह और अन्नू कपूर।
निर्देशक
: फारूक कबीर
ओटीटी
: डिजनी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग: **


हिंदी सिनेमा में एक कहावत खूब सुनने को मिलती है, चाय से केतली गरम। विलेन के पीछे खड़े होने वाले बदमाशों के किरदारों से शुरू करके पहले साउथ में मेन विलेन और फिर हिंदी सिनेमा में मेन हीरो बन गए विद्युत जामवाल की मेहनत पर उनकी ही टीम पानी फेर रही है। और, इसका असर अब दिखने भी लगा है। कमांडो सीरीज की फिल्मों से विद्युत ने जो कुछ हिंदी सिनेमा के दर्शकों के बीच कमाया था, वह सब ‘खुदा हाफिज’ हो गया है।

Khuda Hafiz Review by Pankaj Shukla vidyut jammwal shivaleeka oberoi annu Kapoor faruq kabir
खुदा हाफिज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

कहानी है लखनऊ के समीर चौधरी और नरगिस की। आज से 13 साल पहले एक हिंदू और एक मुस्लिम लड़की की अरेंज्ड मैरिज क्यों हो रही है, निर्देशक ढंग से समझा नहीं पाता। पहले निकाह होता है फिर फेरे होते हैं और शादी करके दोनों सेटल भी ढंग से हो पाएं कि सन 2008 की आर्थिक मंदी आ जाती है। रवीश कुमार तब से टीवी पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। समीर की एजेंसी बंद हो जाती है। नरगिस की नौकरी छूट जाती है और दोनों विदेश में नौकरी पाने की कोशिश में जुट जाते हैं। एक दगाबाज एजेंट किसी तरह झांसा देकर नरगिस को एक अरब देश नोमान (काल्पनिक देश) भेज देता है। और, फिर समीर वहां पहुंच जाता है अपनी नरगिस को ढूंढने जो खो चुकी है वेश्यावृत्ति का पेशा करने वालों के जंगल में।

Khuda Hafiz Review by Pankaj Shukla vidyut jammwal shivaleeka oberoi annu Kapoor faruq kabir
खुदा हाफिज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘खुदा हाफिज’ के निर्देशक फारुक कबीर उन अजीज मिर्जा के शागिर्द रहे जिनके वालिद अख्तर मिर्जा ने कभी ‘नया दौर’, ‘वक्त’ और ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ जैसी फिल्में लिखीं। नाना मुराद उनके मुगले ए आजम के जमाने के रहे और इनका खुद रामपुर खूब आना जाना रहा। पिछली फिल्म ‘अल्लाह के बंदे’ और इस बार ‘खुदा हाफिज’। राष्ट्रीय फिल्म सेवक संघ की मुंबई में बढ़ती गतिविधियों के बीच कुमार मंगत पाठक को इस फिल्म के लिए राजी कर पाए, इसके लिए वह और कुमार मंगत दोनों बधाई के हकदार हैं। ‘मुगल ए आजम’, ‘पाकीजा’, ‘निकाह’, ‘तवायफ’, ‘सनम बेवफा’ और ‘वीर जारा’ जैसी मुस्लिम सोशल फिल्में अब बनती कहां हैं, फारुक कबीर ने वैसा ही कुछ करने की कोशिश तो की, पतंग में कन्ना भी सही बांधा लेकिन, उनको उड़ान देने वाले साथी सही नहीं मिले। पतंग मांझा भर ही उड़ पाई थी किसी ने सद्दी से काट दी।

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Khuda Hafiz Review by Pankaj Shukla vidyut jammwal shivaleeka oberoi annu Kapoor faruq kabir
खुदा हाफिज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म का सेट अप ठीक है। कहानी का जियोग्राफिया भी ठीक ही है। बस, विपिन शर्मा को देखकर पहली झलक उनकी बदमाश की ही लगती है और विपिन शर्मा जैसे ही बाकी सारे किरदार भी फिल्म में हैं। बिल्कुल फिल्मी। कहानी कभी हकीकत के करीब आ ही नहीं पाती। दर्शक बस विद्युत जामवाल की तरह अंगुलियां चटकाता रहता है कि भई अब शुरू हो एक्शन सीन। फारुक कबीर ने कहानी का फर्मा सही पकड़ा लेकिन छपाई के रंग सही नहीं ला पाए। आर्थिक मंदी के दौर में भारत से अरब देशों को लड़कियों की सप्लाई का मुद्दा अच्छी कहानी बन सकता था। अपनी बीवी को बचाने निकले पति का आर्क सही होता तो कहानी कहां से कहां पहुंच सकती थी। लेकिन जितनी बढ़िया लॉग लाइन फारुक ने कुमार मंगत को समझाई होगी, कहानी उतनी बढ़िया बनी नहीं। फारुक बतौर राइटर भी फेल रहे और बतौर डायरेक्टर भी।

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Khuda Hafiz Review by Pankaj Shukla vidyut jammwal shivaleeka oberoi annu Kapoor faruq kabir
खुदा हाफिज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

अब बात कर लेते हैं फिल्म में एक्टिंग की। विद्युत जामवाल ने अगर कहानी को सोचने और परदे पर रोने का अपना अंदाज जल्दी नहीं बदला तो ये बात बात पर नेपोटिज्म के मुद्दा लाकर डिजनी प्लस हॉटस्टार अनइन्स्टाल कर देने वाले लोग उनके जैसे बाहरियों के लिए दोबारा इसे इन्स्टॉल करेंगे नहीं। ये और बात है कि आईपीएल शुरू होते ही ये सब ट्विटर योद्धा फिर से इसी एप को डाउनलोड करेंगे। दबा के मैच देखेंगे और खूब शोर भी लगाएंगे। दफ्तर दफ्तर सीडी लेकर घूमने वाले विद्युत जैसा मौका सबको हिंदी सिनेमा में मिलता नहीं है। जंगली में एक मौका वह पहले भी खो चुके हैं।

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