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Film Review: 'गली गुलियां' की जटिलता और मनोज वाजपेयी की सरल बातें, रोमांच बढ़ाएंगी

Fri, 07 Sep 2018 12:26 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 07 Sep 2018 12:26 PM IST
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movie review Manoj Bajpayee starrer gali guliyan film review
गली गुलियां जटिल फिल्म है। इसमें मन-मस्तिष्क की संकरी भूल-भुलैयाएं कहानी में रोमांच बनाए रखती हैं लेकिन मुश्किल यही कि फिल्म साधारण सिनेमा के दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती है। एक ऐसा इंसान यहां कहानी के केंद्र में है जो बंद दरवाजे वाले कमरे जैसा है। जिसके भीतर अंधेरा है और सोच में बरसों के जाले लगे हैं। गुजरी जिंदगी के कीट-पटंग वहां घर किए हुए हैं। जिनकी दिलचस्पी इंसान के मन की गहराइयों के अंधेरों-उजालों को देखने-समझने में है, उन्हें लेखक-निर्देशक दीपेश जैन की यह फिल्म पसंद आएगी।
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फिल्म के नायक खुद्दोस (मनोज बाजपेयी) की दुनिया रहस्यमयी है। वह अकेलेपन की जिंदगी जी रहा है। उनसे अपना एकांत खुद चुना है लेकिन दूसरों की जिंदगी में चोरी-छुपे झांक कर खुद को व्यस्त रखता है। वह पेशे से इलेक्ट्रीशियन है और पुरानी दिल्ली की गलियों और कई लोगों के घरों में उसने कैमरे फिट कर दिए हैं। घर में लगे कंप्यूटर पर वह सबकी जिंदगियों पर नजर रखता है कि कहां-क्या-क्यों हो रहा है। बिजली के उलझे तारों की तरह ही उसके बाल-दाढ़ी हैं और वह मनोरोगी लगता है। उसका एकमात्र मित्र गणेशी (रणवीर शौरी) है।

वह खुद्दोस को बार-बार अपनी जिंदगी से बाहर निकल आने को कहता है लेकिन कहानी तब मोड़ लेती है जब अचानक खुद्दोस एक बच्चे के पीटे जाने और रोने की आवाज सुनता है। धीरे-धीरे आवाजें बढ़ती है और खुद्दोस रोते हुए बच्चे को तलाश करना चाहता है, जो तमाम कोशिशों के बाद भी उसे नहीं मिल रहा। खुद्दोस के लिए बच्चे की तलाश जिंदगी का उद्देश्य बन जाती है। क्या बच्चा उसे मिलेगा? उसकी पिटाई और रोने का रहस्य खुलेगा? क्या खुद्दोस की जिंदगी बदलेगी? कहानी इन्हीं सवालों के जवाब देती है। शुरुआत में जटिल लगने वाली बातें अंत आते-आते सरल हो जाती हैं।
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गली गुलियां अपनी मेकिंग में चुनौतीपूर्ण और साहसिक दृश्य सामने लाती है। यह बच्चों और बड़ों के मनोविज्ञान की ऐसी परतें खोलती हैं जो कई जगहों पर डराती है। कैसे बड़े अपनी जिद पूरी करने के लिए बच्चों को किसी भयावह संसार में धकेलते हैं। इसका बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। बच्चों और बड़ों के रिश्तों में आती दरारों पर भी फिल्म बात करती है।

मनोज बाजपेयी शानदार रोल में हैं। उन्हें यहां अभिनय करते देखना, अलग अनुभव से गुजरना है। खुद्दोस के जटिल किरदार को उन्होंने जिस तरह जीया है, वह बताता है कि मनोज इंडस्ट्री के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में हैं। वह चुके नहीं हैं। बच्चे की भूमिका में ओम सिंह भी जमे हैं। रणवीर शौरी, नीरज कबी और शहाना गोस्वामी अपनी भूमिकाओं में फिट हैं।
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