Bhoomi Movie Review: भूमि देख कर संजय दत्त के फैन्स संतुष्ट होंगे कि उनके हीरो के लिए यह परफेक्ट कमबैक है। फिल्म का मूल उद्देश्य भी कहीं न कहीं यही है। 2016 में जेल से रिहाई के बाद संजय पहली बार पर्दे पर आए हैं। फिल्म की शुरुआत से अपनी बेटी से बहुत स्नेह करने वाले पिता से लेकर अदालत में दुख, हताशा, क्रोध से बिफरते और अंततः खलनायकों को पूरी क्रूरता से ठिकाने लगाते हुए संजय बताते हैं कि उनकी संवेदनाएं, भुजाएं तथा ऊर्जा कम नहीं हुई हैं। 60 की उम्र की तरफ बढ़ते हुए भी उनमें दर्शकों को बांधे रखने का जादू कायम है। संजय फिल्म का सबसे सकारात्मक बिंदु हैं।
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भूमि
उनकी बेटी की भूमिका में अदिति राव हैदरी भी जमी हैं और पिता-पुत्री स्नेह के क्षणों में आपको बांधे रखते है। लेकिन यहां समस्या है फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट। शुरू से अंत तक आप जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है। 1980 के दशक की खलनायकी भी अखरती है। हालांकि शरद केलकर ने अपना रोल बखूबी ढंग से निभाया है। फिल्म आगरा में जूते बनाने का काम करने वाले अरुण सचदेवा (संजय दत्त) और उसकी बेटी भूमि (अदिति राव) की है। भूमि को पिता ने अकेले पाला, पढ़ाया-लिखाया है। भूमि वेडिंग प्लानर है लेकिन दूसरों के जीवन में खुशियां सजाते हुए जब उसकी शादी का दिन आता है तो वह गैंगरेप जैसे जघन्य हादसे की शिकार हो जाती है।
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सनी लियोनी
इसके बाद कमजोर मंगेतर, पुलिस-अदालत, हीरोइन के चरित्र तथा वर्जिनिटी पर सवाल, महिलाओं पर अत्याचार तथा महिला सशक्तिकरण के कड़क संवाद और आखिरी दौर में दमनकारियों पर पिता के गुस्से का फूटता बादल। हाल के समय में मातृ, मॉम से लेकर पिंक जैसी फिल्मों के कथानक के केंद्र में रेप रहा है। भूमि भी अपने विमर्श और विचारों में लगभग वही बातें कहती है, जो इन फिल्मों में आप देख-सुन चुके हैं। अतः नएपन की गुंजाइश कम है। अच्छा यह है कि भूमि शिकार होकर चुप बैठ नहीं जाती। हर तरह से प्रतिकार करती है।
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भूमि
सबसे ज्यादा आप निर्देशक ओमंग कुमार से निराश होते हैं। दृश्य संयोजन, संवादों और सनी लियोनी ट्रिपी ट्रिपी जैसे अश्लील डांस को देखते हुए कभी-कभी लगता है कि क्या वे सचमुच रेप जैसे अपराध के विरुद्ध हस्तक्षेप कर रहे हैं या फिर इसे केवल पर्दे पर भुना रहे हैं। मैरी कॉम से शुरुआत करते हुए उन्होंने जो चमक दिखाई थी, वह सरबजीत से भूमि तक आते हुए काफी कम हो गई है।
इसमें संदेह नहीं कि ओमंग कहानी में परिवेश को खूबसूरती से रचते हैं, जिससे किरदार और घटनाक्रम ताकत के साथ उभरते हैं। फिल्म दूसरे हिस्से में रेप केंद्रित होने और खूनी बदले के कारण भारी हो जाती है। इसके बावजूद अगर आप संजय दत्त के फैन हैं और 1980-90 के दशक में उनकी फिल्मों का आनंद उठाया है तो भूमि राहत देगी। संजय का यह नया अवतार आपको आश्वस करेगा कि वह आगे भी एंटरटेन करेंगे।
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