-निर्माताः स्विस एंटरटेनमेंट
-निर्देशकः अपूर्व लखिया
-सितारेः श्रद्धा कपूर, सिद्धांत कपूर, अंकुर भाटिया
रेटिंग **
फिल्म अंडरवर्ल्ड की दुनिया के एक भाई और एक आपा (बहन) की कहानी है। निर्देशक अपूर्व लखिया ने अगर इन भाई-बहन की तस्वीरें ठीक से देखी होतीं तो श्रद्धा कपूर और सिद्धांत कपूर को बिल्कुल कास्ट नहीं करते। ये भाई-बहन जब-जब हसीना पारकर और दाऊद इब्राहिम के रूप में पर्दे पर आते हैं, खटकते हैं। यह बेहद खराब कास्टिंग है। इसके बाद फिर कोई बात जम नहीं पाती। फिल्म शुरू होते ही निर्माता-निर्देशक दाऊद, उसके पिता, भाई और बहन के महिमा मंडन में लग जाते हैं।
फिल्म हसीना पारकर (श्रद्धा कपूर) की जिंदगी के एक दिन की कहानी है, जिसमें उसे अवैध वसूली/ प्रोटेक्शन मनी/ धमकी के एक मामले में अदालत में पेश होना पड़ा। दोनों पक्षों द्वारा रखी गई बातों में हसीना की जिंदगी को बुना गया है। अदालत की कार्रवाई में बार-बार फ्लैशबैक आते हैं। जिनमें गाने भी होते हैं!
हसीना बताती है कि 12 भाई-बहनों के परिवार को चलाने वाले पिता रिश्वतखोर नहीं बल्कि ईमानदार पुलिसवाले थे। जो अपने दोनों बेटों दाऊद और साबिर पर बहुत सख्त थे। इसके बावजूद गरीबी, दूसरों की गुंडागर्दी और पुलिस द्वारा अपराध करने पर शह दिए जाने की वजह से वे गलत रास्ते से होते हुए बड़े तस्कर बन गए।
फिल्म का पहला हिस्सा 1970-80 के दशक में मुंबई अंडवरर्ल्ड के गैंगवार को डॉक्युमेंट्री जैसे दिखाता है। इसमें दाऊद का पठान गैंग से संघर्ष, हत्याएं, पुलिस का अंडरवर्ल्ड को खत्म करने का ताबड़तोड़ अभियान और दाऊद का दुबई भागना शामिल है। यहीं फ्लैशबैक में हसीना का निकाह, उसके बच्चे, खुशनुमा सीधी-सरल जिंदगी और अंततः पति की अरुण गवली गैंग के लोगों द्वारा हत्या दिखाई गई है। दूसरे हिस्से में हसीना का वह रूप है, जिसमें वह दाऊद के नाम और डर का इस्तेमाल करके हजारों लोगों की आपा बन जाती हैं। सातवीं पास हसीना कोर्ट में कहती हैः लोगों ने इज्जत बख्शी और मैंने कबूल की। अंतः में हसीना का अदालत जमानत पर रिहा कर देती है।
आपा के रोल में श्रद्धा का मेक-अप गेट-अप ऐसा है कि डायलॉग बोलने के लिए भी उनका मुंह नहीं खुलता। लगता है वह दोनों तरफ रसगुल्ले दबाए हैं। वहीं सिद्धांत कपूर दाऊद इब्राहिम कम और पिता शक्ति कपूर की तरह ज्यादा दिखते हैं। उनके अभिनय में दम नहीं है। यहां कहानी तारीखी दस्तावेजों जैसी है। हर पांच-सात मिनट में किसी घटना का दृश्यांकन सामने आता है। मुकम्मल कहानी की जगह घटनाओं के छोटे-छोटे टुकड़े। जो नहीं बांधते।
फिल्म की एक और मुश्किल यह है कि कहीं भी आपा के रूप में हसीना पर ठोस और तथ्यात्मक बातें नहीं है। सब कहा-सुना है क्योंकि कोई गवाह नहीं है। सरकारी वकील दोहराती रहती है कि दाऊद के नाम का इस्तेमाल करके हसीना ने अपने खौफ का दायरा इतना बढ़ा लिया है कि कोई उसके खिलाफ गवाही देने को तैयार नहीं। जिस एनआरआई बिल्डर की एफआईआर पर यह केस बन, वह तक दुबई जाकर गायब हो गया! लखिया ने भाई-बहन के रिश्ते की संजीदगी, उनका दर्द उभारने की कोशिश की परंतु नाकाम रहे। फिल्म में ऐसी तमाम बातें हैं जो आप मुंबई अंडरवर्ल्ड पर आई दर्जनों फिल्मों में देख चुके हैं। नया कुछ नहीं है।