Web Series Review: मुम्भाई
डिजिटल स्पेस में सबसे तगड़ा कंपटीशन अगर किसी कथानक को लेकर है तो वह है अपराध आधारित कहानियां। टेलीविजन की तीन ‘सी’ यानी सिनेमा, क्राइम और क्रिकेट का ओटीटी पर भी जलवा रहा है और हर ओटीटी अपने हिसाब से इन तीनों को अपने ग्राहकों के बीच परोसने की कोशिश में लगा है। ऐसी ही एक कोशिश की है एकता कपूर ने अपनी टीम के साथ एक नया अपराध शो ‘मुम्भाई’ बनाकर। एकता कपूर जिस तरह के कंटेंट की ‘क्वीन’ छोटे परदे पर रही हैं, वे कहानियां ओटीटी पर बिकती नहीं हैं और एकता कपूर ने जो कुछ ‘बेचने’ का बीड़ा ओटीटी के लिए उठाया है, उसने गब्बर सिंह के हिसाब से देखें तो उनका नाम एकदम ‘मिट्टी’ में मिला दिया है। वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ इन दोनों ध्रुवों के बीच की रात पकड़ने की कोशिश करती है और संतुलन बनाने में नाकाम रहती है।
MUM BHAI REVIEW: नहीं जमा एकता कपूर और अपूर्व लखिया की जोड़ी का रंग, मुम्भाई की ये हैं कमजोर कड़ियां
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वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ एकता कपूर और उनके जिगरी निर्देशक अपूर्व लखिया के दिमाग की उपज है। हुसैन जैदी की ही तरह अपूर्व लखिया को भी ये लगता है कि मुंबई के अंडरवर्ल्ड को उनसे बेहतर कोई नहीं समझता लेकिन समझना यहां ये जरूरी है कि अपराध की कहानियों को परदे पर कहने का तरीका लगातार बदल रहा है। वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ की कहानी में दम है, इसके मुख्य कलाकारों ने काम भी बढ़िया किया है, लेकिन इसका निर्देशन लचर है और इसकी सेटिंग अधकचरी। एक अपराध सीरीज का तनाव, रहस्य, रोमांच यहां नहीं पनप पाता। सीरीज की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी है इसका एक्शन डिपार्टमेंट।
वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ की कहानी दो ढाई दशकों के बीच तैरती है। पिछली सदी के नौवें दशक की शुरूआत से लेकर नई सदी के शुरू के सालों तक फैली इस कहानी का एक सिरा मैंगलोर से जुड़ता है और दूसरा मुंबई से। मैंगलोर से आया भाई यहां मुंबई में मुम्भाई बन जाता है। मां के आंचल पर हाथ डालने वाले ‘गुरुजी’ को पहला राशन पानी देने वाला भास्कर मैंगलोर से मुंबई आता है तो बड़े शेट्टी से मिलता है। क्लास ऑफ 83 का हिस्सा बनने से पहले वो तमाम दूसरे काम भी करता है लेकिन पुलिस में एक बार चमक बिखेरने के बाद एटीएस का कुंबले भी वही बनता है।
वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ जितने हिस्सों में बंटी है, उसमें बीच बीच में शरद केलकर की आवाज कहानी की कड़ियां पिरोती चलती है। लेकिन, किसी अपराध कथा में वॉयस ओवर करके अगर बताना पड़े कि कहानी किधर जा रही है तो फिर इससे तो पटकथा की कमजोरी ही जाहिर होती है। परदे पर जो करके नहीं दिखाया जा सकता, उसे पटकथा में रखने की जरूरत ही नहीं है। अपूर्व लखिया ने अपने साथ लेखकों की जो टीम खड़ी की है, वह दाएं बाएं भटकती रहती है। माहौल जरूर बढ़िया सेटअप करती है ये टीम लेकिन एक कड़ी से दूसरी कड़ी तक जाने के लिए जिस तरह के सहज प्रवाह की जरूरत ऐसी कहानियों में होती है, उसे ये टीम पकड़ नहीं पाई। अपराधियों और पुलिस के बीच की भागदौड़ को परदे पर उसके पूरे तनाव के साथ न दिखा पाना सीरीज की दूसरी कमजोर कड़ी है। ऐसी सीरीज रीयल लोकेशन पर जितनी ज्यादा शूट की जाए, उतनी ही दमदार रहती है। लेकिन, यहां लगता है कि जैसे बस सीरीज छाप देनी है।
हीरो या हीरोइन के भाइयों के किरदार करते रहे अंगद बेदी वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ की असल चमक हैं। भास्कर के रोल में उन्होंने कमाल का अभिनय किया है। फिल्मवालों को इसे नोटिस करना चाहिए और एक अच्छे कलाकार को साइड लेन से निकालकर मेन स्ट्रीम वाले रोल देने चेहिए। सिकंदर खेर ने भी मेहनत काफी की है और ये परदे पर नजर भी आती है। समीर धर्माधिकारी ने कहानी को ठीक ठाक सपोर्ट किया है। संदीपा धर के अभिनय की धार कमजोर होती दिखने लगी है। उन्हें खुद पर और काम करने की जरूरत है। वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ इस सीजन की एक कमजोर वेब सीरीज है, जो नेटफ्लिक्स पर आ चुकी ‘क्लास ऑफ 83’ के सामने कहीं नहीं टिकती।
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