हिंदी सिनेमा दिखावे का उद्योग है। यहां लोग अपनी कामयाबी की तो नुमाइश करते ही हैं, अपने संघर्ष को भी ऐसा फिल्मी स्टाइल में पेश करते हैं कि एकबारगी तो अच्छे खासे ठीक ठाक इंसान को भी लगने लगा कि काश! हमें भी इतनी ही मुसीबतों से होकर गुजरना पड़ा होता। निर्माता निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ ऐसी ही एक फिल्म है, जिसे बनाने में आई दिक्कतों की तमाम कहानियां हिंदी फिल्म जगत में तैरती रहती हैं। खुद इसके निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा अपनी इस फिल्म की मेकिंग के तमाम किस्से बताते रहते हैं। फिल्म उन्होंने अपने भाई वीर को समर्पित की है और जैसा कि फिल्म के संवाद लेखक इम्तियाज हुसैन कहते हैं कि विधु के पसंदीदा निर्देशक फ्रांसिस फोर्ड कोपोला रहे हैं तो उनकी तरह का ही नाम रखने को विधु ने भी अपने नाम को विस्तार दे दिया और बन गए, विधु विनोद चोपड़ा। बाद में उनके असिस्टेंट रहे संजय भंसाली भी संजय लीला भंसाली बने। संजय ने फिल्म ‘परिंदा’ के गानों की शूटिंग में विधु की बहुत मदद की। ये फिल्म ‘परिंदा’ ही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
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रामानंद सागर के भाई हैं विधु
‘परिंदा’ तीन नवंबर 1989 को रिलीज हुई। इसकी रिलीज की कहानी भी दिलचस्प रही। लेकिन पहले बात फिल्म के प्रीमियर शो की जिसके लिए विधु ने जब कश्मीर में रह रहीं अपनी मां से मुंबई आने की बात की तो उनके मुताबिक मां को यकीन भी नहीं था कि उनका बेटा हवाई जहाज की टिकट के लायक पैसे जुटा पाएगा। विधु ये बात इस बात के साथ जोड़कर बताते हैं कि मां इस फिल्म के लिए आईं तो वापस कश्मीर नहीं जा पाईं क्योंकि फिर वहां दंगे फसाद शुरू हो गए। विधु चोपड़ा कौन हैं, इसकी खोज अगर की जाए तो लगता यही है कि उन्होंने फिल्म की रिलीज के 30 साल पूरे होने पर जो ये बात कही थी, वह दरअसल अपनी एक और फिल्म ‘शिकारा’ को ध्यान में रखते हुए कही थी। इससे पहले विधु ने कश्मीर के हालात पर बनी अपनी एक और फिल्म ‘मिशन कश्मीर’ के वक्त ही की। हालांकि, विधु को मुंबई में कभी फाकाकशी के दिन गुजारने पड़े हों या फिर कि वह इंडस्ट्री में बिल्कुल नए थे, ऐसा भी नहीं था। मशहूर निर्माता निर्देशक रामानंद सागर उनके बड़े भाई थे और उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने में शुरू के दिनों में मदद भी काफी की। दोनों के पिता एक थे, लेकिन माएं अलग अलग। लेकिन, संघर्ष को ग्लैमर का मुलम्मा चढ़ाने की फिल्म जगत की आदत पुरानी है।
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इम्तियाज हुसैन ने गढ़ा ‘अन्ना’
विधु विनोद चोपड़ा ने सिनेमा में अपने 30 साल पूरे होने पर एक किताब प्रकाशित की थी, “30 इयर्स ऑफ स्ट्राइविंग इन सिनेमा।” इस किताब में विधु के पसंदीदा लेखक रहे अभिजात जोशी फिल्म परिंदा का जिक्र आने पर लिखते हैं कि कैसे उन्होंने और विधु ने नाना पाटेकर को एक मराठी नाटक में देखने के बाद इस फिल्म में अन्ना के किरदार के लिए चुना। खुद विधु ने भी अपने इंटरव्यू में पिछले साल यही दावा किया था कि नाना पाटेकर का फिल्म के लिए चुनाव उन्होंने दादर के एक नाट्यगृह में उनका नाटक ‘पुरुष’ देखने के बाद किया था। वह यह भी कहते हैं कि तब नाना को फिल्मों में कोई नहीं जानता था, हालांकि रंगमंच में उनका बड़ा नाम हो चुका था। लेकिन, फिल्म के संवाद लेखक इम्तियाज हुसैन के मुताबिक इस किरदार की पर्दे पर इस तरह अवतरित होने के पीछे की कहानी कुछ और ही है। इम्तियाज कहते हैं, “हिंदी सिनेमा में अभिनेता हों या निर्देशक, लेखकों के नामों का जिक्र बहुत कम करते हैं। मुझे अन्ना के किरदार की लाइनें अब तक याद हैं। ‘ना भाई ना बहन ना बेटा, धंधे के मामले में कोई किसी का भाई नहीं, कोई किसा का बेटा नहीं। करन को चुप रहना होगा या जाना होगा। उसको अपनी बोट पे ले जा, समझा, नहीं समझे तो गोली मार दे।’, ये अन्ना के किरदार का असली खाका है। ये संवाद मुझे 30 साल बाद अब भी याद है तो इसलिए क्योंकि मैंने अन्ना को गढ़ा है, क्रिएट किया है।” वह ये भी बताते हैं कि नाना पाटेकर इस फिल्म में कैसे आए।
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नाना पाटेकर ने जीता नेशनल अवॉर्ड
चर्चित हॉलीवुड फिल्म ‘ऑन द वाटरफ्रंट’ से प्रेरित फिल्म ‘परिंदा’ की कहानी वैसी है जैसी अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म ‘दीवार’ की या फिर आमिर खान और रजित कपूर की फिल्म ‘गुलाम’ की। ‘परिंदा’ के दो भाई करन और किशन हैं। दोनों अनाथ। मुंबई की सड़कों पर पले बढ़े। छोटे भाई को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए किशन अपराध के दलदल में उतर जाता है और अन्ना सेठ के लिए काम करता है। करन का दोस्त प्रकाश पुलिस अफसर है और अन्ना के गैरकानूनी धंधों की जानकारी रखता है। प्रकाश का कत्ल दोनों भाइयों के बीच टकराव की पहली कड़ी बनता है। फिल्म की कहानी में इसके बाद तमाम दांव पेंच हैं। कहानी अपराध और अपराधी में किससे बचें, किसे बचाएं का तार पकड़कर बहुत ही संतुलन के साथ आगे बढ़ती जाती है। कहानी में करन और पारो की मोहब्बत है। करन और किशन के बीच के झंझावात हैं। बड़े भाई की लाचारी है। छोटे भाई का गुस्सा है। और, इन सबके बीच जरायम की आग पर पकती रहती है हांडी अन्ना की। सीनों में दहकती आग फिल्म के क्लाइमेक्स में बाहर आती है और सब कुछ जलाकर खाक कर देती है। अपराधी को भी और अपराध की दुनिया को भी। फिल्म ने हिंदी सिनेमा में अपराध आधारित सिनेमा को एक नई शक्ल देने में मदद की। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। भारत की तरफ से नामित होकर ऑस्कर तक भी गई। फिल्म को कामयाबी दिलाने में नाना पाटेकर के किरदार का खासा योगदान रहा।
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इसलिए नसीर ने कर दी ना
फिल्म ‘परिंदा’ के संवाद लेखक इम्तियाज हुसैन के मुताबिक फिल्म में विलेन के किरदार का नाम पहले पाट्या था जो उस समय के एक बड़े डॉन युसूफ पटेल के नाम पर रखा गया। इम्तियाज बताते हैं, “जब मैं इस फिल्म का हिस्सा बना तो मुझे फिल्म की पटकथा का 16वां ड्राफ्ट मिला था। फिल्म में विलेन का नाम था पाट्या और इसे परेश रावल करने वाले थे। ये रोल नाना के पास कैसे गया इसका भी दिलचस्प किस्सा है। दो भाइयों की इस कहानी में बड़े भाई किशन का रोल सबसे पहले नसीरुद्दीन शाह को करना था। उनको मैंने विधु के घर पर कहानी सुनाई। विधु नहाने जा रहे थे औऱ मुझे बोलकर गए कि इनको पूरी कहानी मत सुनाना बस इंटरवल तक ही सुनाना, लेकिन एक लेखक के तौर पर मैंने ईमानदारी दिखाते हुए नसीर को पूरी कहानी सुना दी। तो नसीर बोले जब छोटे भाई का मर्डर हो जाएगा तो उसके बाद हॉल में कौन रुकेगा। और, ये कहकर उन्होंने फिल्म छोड़ दी।” नसीर के बाद परिंदा में किशन का ये रोल अमिताभ बच्चन को भी सुनाया गया और फिर नाना पाटेकर ये किरदार करने को तैयार हो गए। इम्तियाज बताते हैं, “अनिल कपूर को तब लगा कि अगर नाना पाटेकर ये रोल करते हैं तो उनका रोल कमजोर हो जाएगा। अनिल के कहने पर हम जैकी श्रॉफ से मिले और जैकी ने कहानी सुनते ही बोल दिया, ‘”ठीक है बिड़ू, मैं करेगा ये फिल्म।’ फिल्म में जैकी श्रॉफ का एक सीन है जिसमें वह फूटफूट कर रोते हैं। इस सीन में किशन अपने गांव में बसने के सपने करन को समझा रहा है। ये जैकी श्रॉफ के करियर का सबसे लंबा अनकट सीन है, जिसे करने के लिए मैंने जैकी को कई कई दिन रात जागकर रिहर्सल कराई थी।”
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