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Film Review: बनारस की घटती चमक से रूबरू करवाता है 'मोहल्ला अस्सी', रिव्यू पढ़कर ही घुसना

रवि बुले,अमर उजाला Updated Fri, 16 Nov 2018 04:46 PM IST
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sunny deol mohalla assi is full on drama and comedy film
Mohalla Assi - फोटो : file photo
-निर्माताः विनय तिवारी

-निर्देशकः डॉ.चंद्रप्रकाश त्रिवेदी
-सितारेः सनी देओल, साक्षी तंवर, रवि किशन, राजेंद्र गुप्ता, सौरभ शुक्ला
रेटिंग **
दूरदर्शन के दिनों के धारावाहिक चाणक्य और फिल्म पिंजर के लिए पहचाने जाने वाले निर्देशक डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी  की फिल्म मोहल्ला अस्सी अगर समय से आ जाती तो बेहतर होता। लेकिन सितारे-निर्माता-निर्देशक की अनबन, फिल्म के विरुद्ध मुकदमे, ऑन लाइन लीक होने और सेंसर में उलझने से इसे बहुत नुकसान हुआ।
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Mohalla Assi - फोटो : file photo

फिल्म हिंदी के चर्चित उपन्यासकार काशीनाथ सिंह के प्रसिद्ध उपन्यास काशी का अस्सी का सिनेमाई-रूपांतरण है। इसकी खूबी ऐक्टरों का मंजा हुआ अभिनय है परंतु कमजोर पटकथा से यह फिल्म झूल जाती है। पहला हिस्सा जहां बातों को खींचता है, वहीं दूसरे में घटनाएं और किरदार लड़खड़ा जाते हैं। क्लाइमेक्स हड़बड़ी में सिमटता है। कहानी बनारस की घटती हुई चमक और कारोबार में बदलती आध्यात्मिक पहचान को रेखांकित करती है।

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मोहल्ला अस्सी - फोटो : file photo

यह बदलाव स्थानीय लोगों के लिए चिंता का सबब है परंतु मुश्किल यह भी है समय के साथ देश में सांस्कृतिक पहचान और इसके चिह्न इतनी तेजी से अलग-अलग स्तरों पर बदल रहे हैं कि उनसे लड़ना किसी के लिए संभव नहीं दिख रहा। परिवर्तन ही शाश्वत है, यह पंक्ति हमारे समय को सबसे गहराई से रेखांकित करती है।

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मोहल्ला अस्सी फिल्म का सीन - फोटो : file photo

फिल्म के केंद्र में संस्कृत पढ़ाने वाले पांडे जी (सनी देओल) और उनकी पत्नी (साक्षी तंवर) हैं, जो बदलते समय के बीच भी पुरानी आस्थाओं के साथ जी रहे हैं। मिनरल वाटर के दौर में गंगा के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा कैसे बनी रहेगी, जबकि खुद भगवान शिव पांडे जी को जगाने आएंगे! रवि किशन, सौरभ शुक्ला और राजेंद्र गुप्ता के किरदार और संवाद बदलते हुए बनारस और वहां की परंपरा से जुड़ी बातें सामने रखते हैं।

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मोहल्ला अस्सी की शूटिंग के दौरान सनी देओल - फोटो : file photo

जबकि जाते हुए 1980 के दशक और आते हुए 1990 के दशक के बीच राम मंदिर आंदोलन बनारस के जन-जीवन को प्रभावित करता है। फिल्म डेढ़ घंटे में काफी कुछ कहती है परंतु उपन्यास से पीछे रह जाती है। वैसे सुखद यह है कि बनारसी जीवन का जो रस काशी का अस्सी में है, उसका तत्व यहां बरकरार रहता है।

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