हिंदी सिनेमा के सितारों के प्रशंसकों की हर दौर में एक अलग जमात रही है। लेकिन, मिथुन चक्रवर्ती के प्रशंसकों की जमात का कोई तोड़ नहीं है। नाम के साथ मिथुन लिखना, उनके जैसी हेयर स्टाइल बनाना और उनके जैसे ही आड़ी तिरछी बटनों की पट्टी वाली शर्टें सिलवाना। जो थोड़ा और बड़े वाले थे, वे पैंट में नान चाकू टांगकर भी चलते थे। मोहल्ले का हर शोहदा उन दिनों राजेश खन्ना के फैन से सीधे मिथुन पर आकर टिका होता। बीच में अमिताभ बच्चन की हेयर स्टाइल का भी जमाना आया और वो जमाना भी आया जब उनकी और उनके हेयरड्रेसर की फोटो देश के हर सैलून पर लगना कंपलसरी सा लगता था। लेकिन अमिताभ बच्चन वो सितारे थे जिन्हें छूना मुश्किल था और मिथुन का स्टारडम लोगों को अपना सा लगता था। मृगया के बाद सुरक्षा, वारदात, हम पांच और डिस्को डांसर तक मिथुन ने अपना एक अलग आभा मंडल बना लिया था। मिथुन का फिर वो दौर भी आया जब वह सिर्फ शर्ट बदलकर एक ही लोकेशन पर तीन तीन फिल्में एक साथ शूट कर दिया करते थे। वह लगे थे जल्लाद और चांडाल बनने में और किस्मत ने एक दिन उन्हें बना दिया रामकृष्ण परमहंस यानी नरेंद्र दत्त को स्वामी विवेकानंद बना देने वाले गुरु। फिल्म का नाम था स्वामी विवेकानंद और यही फिल्म हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
बाइस्कोप: मिथुन का ये अभिनय देख साष्टांग दंडवत करते हुए जमीन पर लेट गए थे सुपरस्टार डॉ. राजकुमार
स्वामी विवेकानंद से पहले मिथुन की जो फिल्में 1997 में रिलीज हुईं, उनके नाम रहे शपथ, जोड़ीदार, लोहा, कालिया, गुड़िया, दादागिरी, सूरज, जीवन युद्ध और क्रांतिकारी। और फिर अगले साल यानी 1998 में मिथुन की 17 फिल्में रिलीज हुईं। इन फिल्मों में शामिल थीं, शेर ए हिंदुस्तान, हत्यारा, चांडाल, हिटलर, देवता, मर्द, यमराज, गुंडा वगैरह वगैरह। सिंगल स्क्रीन के सिनेमाघरों में ये फिल्में खूब चलीं और खूब पैसा भी इनके निर्माताओं ने इनसे कमाया। लेकिन, इसी साल रिलीज हुई फिल्म स्वामी विवेकानंद से मिथुन चक्रवर्ती ने अपने एक्टिंग करियर का तीसरा नेशनल फिल्म अवॉर्ड कमाया। नेशनल फिल्म अवॉर्ड की ज्यूरी ने जब ये फिल्म देखी तो हैरान रह गई। किसी को समझ ही नहीं आया कि ये वही मिथुन चक्रवर्ती है जो शर्ट बदलकर एक लोकेशन पर तीन फिल्में शूट कर देता है। ऋषिकेश मुखर्जी तब बोले, ‘ये फिल्म ऐसी है जिसके आगे हर अवॉर्ड बेकार है। ऐसा अभिनय बस ईश्वर ही किसी से करा सकता है, किसी इंसानी निर्देशक की तो बिसात ही क्या। हमें इसके लिए तुम्हें अवॉर्ड तो देना ही है लेकिन फिल्म में चूंकि टाइटल रोल किसी और ने किया है तो बेस्ट एक्टर अवार्ड देना ठीक नहीं रहेगा, हम सब तुम्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड देते हैं।’
मिथुन तो मिथुन ठहरे। न अपमान का भय और न सम्मान का अहंकार। जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया, को जीवन भर मानते रहे मिथुन ने इस पुरस्कार को भी सिर माथे लगाया और फिर लग गए हीरालाल पन्नालाल, सिकंदर सड़क का, गंगा की कसम, संन्यासी मेरा नाम, आया तूफान, आग ही आग, शेरा और तबाही जैसी फिल्में बनाने में। मिथुन ने फुटपाथ की गरीबी देखी है और देश में सबसे ज्यादा इनकम टैक्स देने वाले सितारे का तमगा भी पाया है। इन दोनों हालात के बीच का मिथुन दिल का सच्चा इंसान है। वादे का पक्का दोस्त है और जुबान देकर न मुकरने वाला कलाकार है। स्वामी विवेकानंद में रामकृष्ण परमहंस का किरदार उनको कैसे मिला, इसकी भी दिलचस्प कहानी है। हुआ यूं कि मशहूर फिल्म निर्देशक मणिरत्नम उन दिनों अपनी महात्वाकांक्षी फिल्म इरुवर की प्लानिंग कर रहे थे। ये कहानी दो दोस्तों की कहानी है जो राजनीति में आकर एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। ये वही फिल्म है जिससे ऐश्वर्या राय ने अपना फिल्मी करियर शुरू किया। मणिरत्नम और मिथुन की मुलाकातें हुईं, बातें हुईं लेकिन बात बनी नहीं। फिल्म स्वामी विवेकानंद के निर्देशक जी वी अय्यर और मणिरत्नम पुराने दोस्त हैं। अय्यर ने जब अपनी फिल्म में रामकृष्ण परमहंस के रोल के लिए कोई नाम सुझाने को कहा तो मणिरत्नम ने छूटते ही मिथुन का नाम ले दिया।
मिथुन चक्रवर्ती तक निर्देशक जी वी अय्यर का पैगाम पहुंचा तो उन्होंने मना कर दिया। मिथुन बोले, ये एक भगवान का किरदार है और मैं ठहरा साधारण मनुष्य। सिगरेट पीने वाला। शराब का भी सेवन कर लेने वाला। मैं भला कैसे ये किरदार कर सकता हूं। तमाम मान मनौव्वल हुई लेकिन मिथुन नहीं माने। फिर ईश्वर का चमत्कार जैसा ही कुछ हुआ। अय्यर ने मिथुन से कहा कि ठीक है तुम रोल मत करना लेकिन एक बार लुक टेस्ट करने में क्या जाता है, कम से कम हमें तो तसल्ली हो जाएगी कि हमारा चयन सही था या गलत। मिथुन कभी अपने निर्देशकों का दिल नहीं दुखाते हैं। अय्यर का भी कहना उन्होंने मान लिया। मिथुन का पूरा मेकअप हुआ। बालों का स्टाइल बदला गया। आंखों के कटोरे गढ़े गए। दांतों का पैटर्न बनाया गया और हल्की सी जीभ निकाले मिथुन के जब फोटो खींचे गए तो हंगामा मच गया। जिसने भी ये फोटो देखे, कोई मानने को तैयार नहीं कि ये रामकृष्ण परमहंस नहीं हैं। ऋषिकेश मुखर्जी ने भी नेशनल फिल्म अवॉर्ड की ज्यूरी में यही बोला था कि जो किरदार परदे पर दिख रहा है, उसका अभिनय नहीं किया गया है, उसे जिया गया है। मिथुन चक्रवर्ती ने जी वी अय्यर की जिद पर फिल्म कर तो ली लेकिन उसकी शूटिंग भी तो करनी थी।
जी नेटवर्क के लिए मिथुन की डॉक्यूमेंट्री बनाने के दौरान जब उनसे इस किरदार को लेकर लंबी बातचीत हुई तो मिथुन ने मुझे बताया था, 'एक रोज फिल्म की शूटिंग कहीं खुले में चल रही थी। शॉट खत्म होने के बाद मुझे बताया गया कि बस 10—5 मिनट का ब्रेक है तो मैं बजाय वैनिटी वैन में जाने के वहीं पेड़ के नीचे बैठकर सिगरेट पीने लगा। अभी शूटिंग के कुछ दिन ही हुए थे। मैंने देखा कि कुछ महिलाएं कनखियों से मुझे घूर रही हैं। मुझे कुछ अजीब सा लगा तो मैंने उन्हें अपने पास बुलाया। उनमें से एक ने कहा कि आपने जो रूप धरा है वह हमारे भगवान का है और भगवान के हाथ में सिगरेट शोभा नहीं देती।’ मिथुन ने ये सुना तो उनके तो होश उड़ गए। उन्होंने वहीं सिगरेट फेंकी। डिब्बी भी मोड़तोड कर किनारे डाल दी और प्रण किया कि अब पूरी फिल्म की शूटिंग होने तक सिगरेट नहीं पीनी है और न ही पी।
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