Documentary Review: द सोशल डिलेमा
सिनेमा संदेशवाहक है। अच्छे संदेश का, बुरे संदेश का। ये एक कहानी कहता है। घंटा, डेढ़ घंटा या दो घंटे आपको एक ऐसे संसार में रखता है जो शायद आपने पहले महसूस नहीं किया। इसका भी अपना एक नशा है। आप ओटीटी पर क्या देखते हैं, ओटीटी आपको वैसी ही फिल्में ‘रिकमंडेड मूवीज’ में दिखाता है। ये आपके बिताए हर पल का हिसाब रखता है, आपने क्या स्क्रॉल किया, कहां रुके, किसे फेवरिट मूवी में डाला, किसको थम्ब्स अप दिया और किसे कितना देखने के बाद बीच में छोड़ दिया। लेकिन, सच ये भी है कि लोहा ही लोहे को काटता है। तो इस बार नेटफ्लिक्स लेकर आया है आपके लिए एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म, जिसे देखने के बाद आपका अपने मोबाइल को इस्तेमाल करने का नजरिया बदल सकता है।
The Social Dilemma Review: समझिए कि 'किसके' इशारे पर आपका मोबाइल आपको ही अपना 'गुलाम' बना चुका है
‘द सोशल डिलेमा’ डॉक्यूमेंट्री इसलिए आपका ध्यान खींचती है कि इसमें परदे पर दिखने वाले तमाम जानकार वे लोग हैं जिन्होंने आपके चारों तरफ सोशल मीडिया की लक्ष्मण रेखा खींची है। ये आपको अपने रिश्तेदारों से, दोस्तों से यहां तक कि घर परिवार से दूर कर चुके हैं। यहां हर इंसान बस एक यूजर है। और डॉक्यूमेंट्री बताती भी है कि दुनिया में सिर्फ दो धंधों में उसके प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने वाले को ‘यूजर’ कहकर बुलाते हैं। एक सोशल मीडिया में और दूसरा ड्रग्स के धंधे में। दोनों का ये कनेक्शन बनाकर बताने की एक सच्ची कोशिश भी ये डॉक्यूमेंट्री फिल्म करती है। यहां कैमरे के सामने बैठे जानकार बताते हैं कि पिछले अमेरिकी चुनाव में रूस ने फेसबुक हैक नहीं किया बल्कि इसके टूल्स का शातिराना इस्तेमाल किया। सोशल मीडिया को नियंत्रित करने वाली मशीनें चाहें तो किसी भी देश के नागरिकों को अपना मानसिक गुलाम बना सकती हैं। ऐसा सोचा नहीं गया था, लेकिन ऐसा हो गया है।
इस डॉक्यूमेंट्री में जब गूगल के डिजाइन विभाग में काम करने वाले ट्रिस्टान हैरिस बताते हैं कि दो अरब लोगों के दिमाग पर सीधा असर डालने का काम सिर्फ 50 डिजाइनर्स ने कर दिया हो, ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। ये कैसे होता है इसे समझाने के लिए निर्देशक ओर्लोवस्की ने इन सोशल मीडिया कंपनियों में काम कर चुके दिग्गज लोगों के इंटरव्यू लिए हैं और इनके बीच में एक कहानी रोप दी है ऐसे परिवार की जो सोशल मीडिया के चलते बिखर रहा है। और, सिर्फ परिवार ही नहीं लोगों का आत्मविश्वास भी बिखर रहा है। कहानी के बीच में जब अमेरिका में सोशल मीडिया के असर के चलते आत्महत्या के मामलों में बढ़ोत्तरी का ग्राफ दिखाया जाता है तो आपका ध्यान तुरंत सुशांत सिंह राजपूत की तरफ चला जाता है। फेसबुक का ‘लाइक’ बटन बनाने वाले बताते हैं कि इसे तो ये सोचकर बनाया गया था कि लोगों के बीच में इससे सकारात्मकता फैलेगी, लेकिन किसे पता था कि अपनी किसी फोटो पर कम लाइक मिलने से लोग अवसाद में भी चले जाएंगे।
बचपन में हम सबने पढ़ा है कि साइंस इज ए गुड सर्वेंट बट ए बैड मास्टर। लेकिन, सोशल मीडिया भी साइंस का ही एक हिस्सा है ये कम लोगों ने ही सोचा है। ‘द सोशल डिलेमा’ में दिखाया गया है कि हर पल आपके हाथ के मोबाइल पर जो कुछ भी दिख रहा है या जो कुछ भी नोटीफिकेशन के जरिए आपको दिखाने की कोशिश की जा रही है, वह सब एक ‘योजना’ का हिस्सा है। फिल्म में शुरू में ही बता दिया जाता है कि जिस किसी भी उत्पाद के लिए आपको पैसे नही खर्च करने पड़ रहे हैं, वह सीधे सीधे आपको एक उत्पाद में बदल देता है। और, यह भी कि दुनिया में कुछ भी विशाल या भव्य बिना अपने साथ कोई श्राप लिए जीवन में नहीं आता।
‘द सोशल डिलेमा’ में ये देखकर आप चौंक सकते हैं कि कैसे आपकी स्क्रीन की दूसरी तरफ से संचालित हो रही मशीनें आप पर हर पल नजरें रखे हुए हैं। आप कहां हैं, किसके साथ हैं, आपके आसपास कौन है, इस सब पर नजर रखते हुए आपकी भावनाओं को और आपकी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित किया जा चुका है। जितना आप अपने मोबाइल पर समय बिताते हैं, उतना ही ज्यादा आप इनके चंगुल में फंसते जाते हैं। बच्चों का बर्ताव इन सोशल मीडिया साइट्स के चलते कैसे बदल रहा है, कैसे वे झूठे प्रचार अभियान का हिस्सा बनकर अपना जीवन खतरे में डाल रहे हैं, इन सबका खुलासा इस फिल्म में होता है। और, सबसे खतरनाक खुलासा ये है कि ये मशीनें अब अपने बनाने वालों के नियंत्रण में भी नहीं हैं। ये अपने आप एक नया संसार बना रही हैं। इस संसार का भविष्य बहुत डरावना है।
