निर्माताः प्लान सी स्टूडियोज/वायकॉम 18
निर्देशकः श्रीनारायण सिंह
सितारेः अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर
रेटिंग **
शौचालय जरूरत है। इसके बिना जीवन तकलीफदेह हो सकता है। निर्देशक श्रीनारायण सिंह की फिल्म देखते हुए इस बात का गहरा एहसास होता है।
यह मनोरंजन, सामाजिक संदेश और सरकारी प्रयासों की मिलीजुली कहानी है, जिसमें सरकारी प्रोपगंडे का बिगुल लगातार बजता रहता है, लेकिन सिरे से कोई ठोस बात नहीं उभरती। फिल्म कई मौकों पर मनोरंजन की आड़ में सामाजिक विषयों के पाठ पढ़ाती नजर आती है। यह अखरता है।
लेखक-निर्देशक ने टॉयलेट की समस्या को स्वच्छता के सिरे से उतना नहीं उभारा जितना महिलाओं की प्रतिष्ठा और सम्मान से जोड़ा। असल में इस समस्या के प्रति देश-समाज का ध्यान सबसे पहले तब गया था जब मध्यप्रदेश के बैतूल से एक महिला द्वारा विवाह के दो-तीन दिनों में ही पति का घर छोड़ने की खबर आई थी क्योंकि ससुराल में शौचालय नहीं था।
फिल्म मथुरा के नजदीक एक गांव का जीवन दिखाती हुई केशव (अक्षय कुमार) और जया (भूमि पेडनेकर) के परस्पर आकर्षण, प्रेम और विवाह तक पहुंचती है। परंतु उतार-चढ़ाव तब शुरू होते हैं जब जया को पता चलता है कि केशव के घर में टॉयलेट नहीं है।
महिलाएं सूरज निकलने से खेतों में पहले जाती हैं। शुरुआत में केशव जया को ‘लोटा पार्टी’ का सदस्य बनने के लिए समझाता है और फिर खुद खेतों तथा गांव से गुजरने वाली ट्रेन में शौच के लिए ले जाता है। परंतु यह जुगाड़ समस्या का हल तो नहीं! अंततः जया उसे छोड़ कर चली जाती है और तभी लौटने की कसम खाती है जब घर में टॉयलेट बनवा लेगा। मगर क्या यह इतना आसान है? निर्देशक ने कहानी में ससुर को ‘असुर’ बनाया है।