बीती छमाही की नेटफ्लिक्स की ग्लोबल इंगेजमेंट रिपोर्ट में भारत में बनी फिल्मों और सीरीज ने भी दमदार तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। नेटफ्लिक्स की भारतीय शाखा की मुखिया मोनिका शेरगिल इसका श्रेय अपनी पूरी टीम को देती हैं। मेरठ में जन्मी और दिल्ली में मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के बाद बरास्ता डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकिंग टीवी चैनलों तक पहुंची मोनिका शेरगिल नेटफ्लिक्स इंडिया की वाइस प्रेसिडेंट, कॉन्टेंट हैं और ओटीटी पर प्रसारित होने वाली हर भारतीय फिल्म, वेब सीरीज या डॉक्यूमेंट्री को हरी झंडी दिखाने की आखिरी पायदान भी। मोनिका से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव बातचीत।
Monika Shergill Interview: हमारी सारी कहानियां वैश्विक पसंद की हों, ये जरूरी नहीं, हम अब भारतीय नेटफ्लिक्स है
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नेटफ्लिक्स का सफर भारत में अब तक काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है, इसके बारे में आपका नजरिया क्या है?
साल 2016 के मध्य में नेटफ्लिक्स की भारत में शुरुआत हुई। पहले तीन साल हम सिर्फ एक वैश्विक सेवा प्रदाता कंपनी के तौर पर काम करते रहे। फिर पहली ओरिजिनल सीरीज जो हमने यहां बनाई वह ‘सैक्रेड गेम्स’ सीजन वन थी। जुलाई 2019 में ‘दिल्ली क्राइम’ शो आया। इसी के बाद हमने भारत में अपनी कार्यक्रम निर्माता टीम बनानी शुरू की। शुरू के जो भी शोज थे, वे सीधे हमारे अमेरिका दफ्तर से मंजूर किए गए थे। इधर, हम ये समझने की कोशिश कर रहे थे कि हम इस देश में क्या बनना चाहते हैं। लोग हमें एक अमेरिकन कंपनी के तौर पर देखते थे जो वैश्विक सेवा प्रदाता कंपनी है और अहम सवाल हमारे सामने ये था कि क्या हम पर्याप्त रूप से भारतीय बन सकते हैं?
और, इसका उत्तर क्या मिला?
पिछले तीन-चार साल में हमने अपनी एक स्पष्ट रणनीति तैयार की। हमने तय किया कि हम एक स्थानीय सेवा प्रदाता कंपनी बनना चाहते हैं जिसकी मौजूदगी पूरे संसार में है। हम अब भारतीय नेटफ्लिक्स हैं। हम यहां से कहानियां लेकर पूरे भारत में इनका प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और ये कहानियां उन भारतीयों तक भी पहुंचा रहे हैं जो पूरे विश्व में बसे हुए हैं।
क्या इसका अर्थ ये हुआ कि आप ऐसी कहानियां चुन रही हैं जो वैश्विक पसंद की हों?
नहीं, हमारी सारी कहानियां वैश्विक पसंद की ही हो, ये जरूरी नहीं है। हम अपनी अधिकतर फिल्में और सीरीज भारत के लिए और दुनिया भर में फैले भारतीयों के लिए बनाएंगे। और, इनमें से कुछ कहानियां ऐसी होंगी जो पूरी दुनिया के लिए भी होंगी और ये बारीक सा फर्क हम लोगों को समझा रहे हैं। ‘द रेलवे मेन’, ‘हीरामंडी’, ‘आरआरआर’ या ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ ऐसी कहानियां हैं जो दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों के अलावा गैर भारतीय लोगों को भी पसंद आ रही हैं।
मतलब कि इरादा भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार दुनिया भर में करना है?
इसे हम कुछ उदाहरणों के साथ और बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। विश्व की सारी संस्कृतियां अपना प्रचार प्रसार दुनिया भर में पाती हों, ऐसा नहीं है। कुछ संस्कृतियां निर्यातक स्वरूप की ही होती हैं, जैसे कोरिया। उनका अपना देश बहुत छोटा है लेकिन जो मनोरंजन सामग्री वह बनाते हैं, उसे वह पूरी दुनिया के दर्शकों के लिए बनाते हैं। इसके ठीक विपरीत जापान है। वहां की ज्यादातर कहानियां जापानियों के लिए ही हैं। इसी तरह भारतीय कहानियां अधिकतर भारतीयों के लिए ही हैं। उनकी बसाहट दुनिया में कहीं भी हो सकती है। इसकी जो बारीकियां हैं, उन्हें भारतीय मूल के लोग बेहतर तरीके से समझते हैं। लेकिन, इसमें से ऐसी कुछ कहानियां होगीं जो अमेरिकी, फ्रांसीसी लोगों को भी पसंद आएंगी, यही हमारी बड़ी चुनौती है।