‘आंखें’, ‘वक्त’, ‘सिंह इज किंग’, ‘फोर्स’ और ‘कमांडो’ जैसी फिल्में बनाने वाले निर्माता-निर्देशक विपुल अमृतलाल शाह की पिछले साल रिलीज हुई फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ इन दिनों खूब चर्चा में हैं। उनकी इस साल रिलीज फिल्म ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ को लेकर भी विमर्श चल ही रहा है और इस बीच विपुल अपनी अगली फिल्म पर काम शुरू कर चुके हैं। ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने इन्हीं मुद्दों पर विपुल शाह से उनके कार्यालय में ये एक्सक्लूसिव मुलाकात की।
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‘द केरल स्टोरी’ के दूरदर्शन पर प्रसारण को लेकर चल रहे विवाद पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
सिनेमाघरों में ब्लॉकबस्टर हिट हो चुकी फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ पहले से ही ओटीटी पर उपलब्ध है। लेकिन, ये सिर्फ वयस्कों के लिए है। इस फिल्म के ओटीटी पर आने के बाद देश-दुनिया के कई संगठनों और लोगों ने मुझसे संपर्क किया कि क्या इसका कोई ऐसा संस्करण भी है जिसे हम अपने किशोरवय बच्चों को दिखा सकें। हमने इसका सैटेलाइट संस्करण भी बनाया ही था। दूरदर्शन ने हमसे संपर्क किया कि क्या इसे हम दिखा सकते हैं, तो हमने यही कहा कि हमें इसमें क्या ही आपत्ति हो सकती है।
मेरा प्रश्न इसे केरल में कुछ ईसाई संगठनों द्वारा समूह में दिखाए जाने से है...
ये बहुत ही रोचक पहलू है इस फिल्म का। फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ लव जिहाद की बात करती है कि कैसे एक हिंदू युवती को कुछ मुस्लिम युवक बहला फुसलाकर विदेश ले जाते हैं और एक अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन के हवाले कर देते हैं। हालांकि ये चार लड़कियों की कहानी है और इसमें एक युवती ईसाई भी है लेकिन मुख्य कहानी एक हिंदू युवती की सच्ची घटना पर ही आधारित है। केरल का ईसाई समूह भी इन घटनाओं से भयभीत है, ये उनकी इस पहल से साबित होता है।
और, अब इस पर प्रतिबंध लगाने की बात हो रही है?
इतिहास में फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की परंपरा पहले से ही रही है। ‘किस्सा कुर्सी का’ और ‘आंधी’ पर प्रतिबंध इसका उदाहरण हैं। ऐसे में अब फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ पर प्रतिबंध की मांग उठना कोई नई बात नहीं है। सत्ता में कोई भी रहा हो, ऐसा हमेशा से ही होता आया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें हमारा संविधान देता है।
आप मानते हैं कि फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ समाज के एक खास वर्ग पर निशाना साधती है?
मैं ये पहले भी कह चुका हूं और फिर दोहरा रहा हूं, फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म है। हमने किसी वर्ग को निशाना बनाने या उनके विरुद्ध कोई जनभावना बनाने के लिए ये फिल्म नहीं बनाई। जो कुछ केरल राज्य में बरसों से होता आ रहा है, हमने उस पर शोध किया और ये फिल्म बनाई। हमें किसी खास वर्ग को निशाना ही बनाना होता तो हम ‘द केरल स्टोरी पार्ट 2’ बनाते, ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ नहीं बनाते।