असम विधानसभा चुनाव होने में भले अभी चार महीने का समय बाकी हो, लेकिन इस बार बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकने वाले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी को लेकर एक फिल्म के ट्रेलर ने मुंबई में हलचल मचा दी है। ‘नॉयज ऑफ साइलेंस’ नाम की इस फिल्म में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के मुद्दे को बखूबी उठाया गया है और फिल्म की पूरी शूटिंग भी उत्तर पूर्व भारत में ही की गई है। फिल्म की कहानी एक बेटी की है जो अपनी मां की तलाश में तमाम कष्ट सहती है।
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क्या होगा अगर बरसों से किसी जगह रह रहे किसी शख्स का नाम एक दिन राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर से गायब मिले और क्या होगा अगर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में नाम होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन किसी को पहचानने से इंकार कर दे? सवाल तमाम उठते रहे हैं लेकिन इनके राजनीतिक समाधान पर फिर से बात अगले साल असम विधानसभा चुनाव के आसपास ही शुरू होने के आसार हैं। लेकिन, इस नई फिल्म ने ये मुद्दा फिर से सुलगा दिया है।
फिल्म ‘नॉयज ऑफ साइलेंस’ दो विपरीत कहानियों के एक अहम मुकाम पर आकर एक दूसरे से टकरा जाने का अनूठा प्रयोग है। म्यांमार से आई एक रोहिंग्या समुदाय की बेटी है जिसे अपनी मां की तलाश है। वहीं एक परेशान हाल बंदा अपनी बीवी का नाम राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में दर्ज कराने के लिए दर-दर की ठोकरें खाता दिखता है। भारतीय सिनेमा का ये अपनी तरह का एक अनूठा प्रयोग है जिसमें राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को मुख्य विषय के तौर पर फिल्म में शामिल किया गया है। फिल्म के निर्देशक सैफ बैद्या ने इस फिल्म की शूटिंग त्रिपुरा में की है और इसमें उन्हें वहां के स्थानीय कलाकारों की भी काफी मदद मिली है।
फिल्म में लीड किरदार कर रहीं हैं पूजा झा। जमशेदपुर की रहने वाली पूजा झा के काम को इसके पहले फिल्मों और वेब सीरीज में नोटिस किया गया है, लेकिन ये उनका पहला लीड रोल है। वह कहती हैं, ‘फिल्म ‘नॉयज ऑफ साइलेंस’ एक ऐसे विषय को मानवीय ढंग से परदे पर पेश करती है, जिसकी परतें समझना काफी कठिन होता है। लेकिन, फिल्म के निर्माता और निर्देशक ने इस कहानी को बहुत ही सरल तरीके से परदे पर पेश किया है। ये भावनाओं और संभावनाओं की कहानी कहती फिल्म है। प्रेम, विछोह, आकुलता और विकलता इसकी अंतर्धाराएं हैं।’
पूजा कहती हैं, ‘फिल्म ‘नॉयज ऑफ साइलेंस’ के ट्रेलर को बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। ये फिल्म एक ऐसे विषय को मुख्यधारा के सिनेमा में लाने की कोशिश करती है, जिस पर बातें तो बहुत हुईं लेकिन उसका मानवीय चेहरा किसी ने नहीं देखा। मेरे सामने चुनौती ये भी थी कि मैं त्रिपुरा में शूटिंग करते हुए म्यांमार की बेटी दिखूं और एक भारतीय विषय की संवेदनशीलता को भी सहज और सरल तरीके से परदे पर पेश कर सकूं।’