हिंदी सिनेमा में हर कलाकार की पहली फिल्म पर करोड़ों निगाहें लगी होती हैं। लोग फिल्म देखें या न देखें लेकिन फैसला सुनाने की जल्दी सबको रहती है। इसी फैसला सुनाने वाले दौर में एक डिजिटल फिल्म से अपनी पारी शुरू की है मशहूर अभिनेता परेश रावल के बेटे आदित्य रावल ने। आदित्य ने कैमरे के सामने आने से पहले खुद को कैमरे के पीछे बहुत घिसा है। लिखने की ट्रेनिंग वह अमेरिका से लेकर आए हैं हालांकि सिनेमा सीखना उन्होंने अपनी मां स्वरूप संपत के साथ तब से शुरू कर दिया था, जब वह सिर्फ 19 साल के थे। आदित्य रावल से ये खास बातचीत की पंकज शुक्ल ने।
Interview: पांच साल पुराने ऑडीशन से मिली फिल्म बम्फाड़, पिता से तुलना के सवाल पर खुलकर बोले आदित्य रावल
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मेरी मम्मी एक कलाकार के साथ साथ शिक्षक भी हैं। वह बच्चों को ड्रामा सिखाती हैं। एक बार सूरत में कैम्प करने जा रही थीं और कैम्प उन्होंने इतने सारे कर लिए हैं पर इनका कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं है। तो मैं रहा होऊंगा कोई 19 साल का और मुझे फिल्म बनाना सीखना था। मुझे लगा कि मेरे लिए यह सबसे अच्छा तरीका होगा कि मैं उनके कैम्प्स पर डॉक्यूमेंट्री बनाऊं। इस हिसाब से मैं कुछ नया सीख भी लूंगा, मेरी मम्मी को भी काम आ जाएगा और फिल्म बनाने में तो मेरी बहुत मदद हो जाएगी। उस वक्त मैं खुद ही शूटिंग कर रहा था और खुद ही उसे एडिट भी कर रहा था। कांची पंड्या ने तब शूटिंग में मेरी बहुत मदद की और एडिटिंग में लवेश जैन ने। तो यह सिर्फ गांधी जी की बात नहीं थी।
तो आप थिएटर लंदन में पढ़े, राइटिंग में अमेरिका में कढ़े और अब जाकर अभिनय के पेड़ पर फिल्म बम्फाड़ में चढ़े हैं, काफी तैयारी की है आपने मैदान में उतरने से पहले?
(हंसते हुए) जी बिल्कुल। इंसान जितनी तैयारी के साथ मैदान में उतर सके, उतना बेहतर है। मैंने लंदन में छह महीने की पढ़ाई फिजिकल थिएटर में की। लंदन इंटरनेशनल स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स में जो फिजिकल थिएटर होता है, प्रयोगात्मक थिएटर होता है। फिर मैंने एनवाईयू से एमएफए किया ड्रामेटिक राइटिंग में। जो होता है फिल्म राइटिंग, स्क्रीन राइटिंग और टीवी राइटिंग में। आपने जो मैदान में उतरने की बात कही, वह एकदम सही है। हम टीवी के सामने बैठकर बोल देते हैं कि ये खिलाड़ी भी आउट हो गया। या हममें से कोई क्रिकेट में पहुंच गया तो बोल देते हैं कि यार ये कैसे पहुंच गया। लेकिन लोग ये नहीं जानते कि उसने अपने मोहल्ले के मैदान में या रणजी ट्रॉफी में कितने सौ और दो सौ रन बनाए होंगे तब जाकर कहीं इसका नंबर आ रहा है।
थोड़ा पीछे जाकर देखें तो हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर समझी जाने वाली फिल्म ओह माई गॉड के मूल नाटक कानजी वर्सेज कानजी या किशन वर्सेज कन्हैया का भी आप हिस्सा रहे हैं, तो कभी ये ख्याल आया कि मैं मेहनत कितनी भी करूं, नापा मुझे हमेशा परेश रावल की अदाकारी के पैमाने पर ही जाएगा?
नाटकों में मैं बैकस्टेज काम करता था। एक दो मिनट का अगर कोई रोल हो गया तो वो भी हम कर लेते थे। रही बात पिताजी की तो वे इतने महान कलाकार हैं, इतने पहुंचे हुए कलाकार हैं कि मुझे कोई फिक्र ही नहीं है। अगर मैं उनकी तरह 25-30 साल तक लगातार काम करूं तब भी यह सवाल रहेगा कि मैं उनके हिसाब से नापे जाने लायक हूं कि नहीं। अभी तो मेरी शुरूआत है और इतनी बड़ी बड़ी चीजें सोचने का कोई मतलब भी नहीं है। दूसरी बात ये कि लोगों में मुझे लेकर उत्सुकता तो जरूर बढ़ी होगी। लेकिन परेश रावल जो हैं वो तो हैं। मेरे काम से तो मैं ही दिखाई दूंगा। अगर मेरे काम में लोगों को उनके जैसा कुछ भी दिखा तो मैं इसका शुक्रगुजार रहूंगा।
परेश रावल की अदाकारी का इतना लंबा और इतना विस्तृत ग्राफ रहा है कि इसमें डकैत के विष्णु पांडे से लेकर सरदार के वल्लभ भाई पटेल और हेराफेरी के बाबूराव और उससे भी कहीं आगे बहुत कुछ है, लिखने कहने को। आपको अपने पिता के कौन से किरदार सबसे ज्यादा पसंद आते हैं?
उतना पीछे का तो मुझे याद नहीं हालांकि मैंने उनका काम देखा तो होगा ही। लेकिन उनके अभिनय की जो पहली यादें मेरी हैं, वे हैं तमन्ना और सरदार की। उन दोनों फिल्मों ने ही मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। वही मेरे लिए यादगार हैं। उनको निर्देशक भी बहुत अच्छे मिले। एक निर्देशक ही होता है जो किसी भी फिल्म को आकार देता है। आप जो भी काम करें लेकिन डायरेक्टर ही होता है जो आपसे काम निकलवाए या आपकी परफॉर्मेंस और आपके किरदार को आकार दे। जैसे हमारी फिल्म बम्फाड़ में भी रंजन चंदेल जो हैं…