Independence Day Special: आज भारत अपनी आजादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है। जिसकी धूम आपको स्कूलों से लेकर दफ्तरों और बाजारों में भी दिखाई दे रही होगी। ये दिन हर भारतीय के लिए बेहद अहम होता है। 1947 में आजादी के बाद पहली बार देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर पर ध्वजारोहण करके अपना पहला भाषण दिया था। जिसके बाद से हर साल देश के प्रधानमंत्री दिल्ली में स्थित लाल किले पर ध्वजारोहण करते हैं।
Independence Day Special: 2019 के बाद 2024 में पीएम ने पहनी लहरिया पगड़ी, जानें इस प्रिंट की खासियत
2019 के बाद अब 2024 में पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के दिन लहरिया प्रिंट की पगड़ी पहनी। ये प्रिंट राजस्थान की शान माना जाता है।
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सबसे पहले देखें 2024 का लुक
सबसे पहले एक नजर डालते हैं पीएम मोदी के इस साल के लुक पर। इस साल पीएम ने उन्होंने सफेद कुर्ता-चूड़ीदार के साथ ब्लू कलर की बंदगला हॉफ जैकेट पहनी थी। इसके साथ उन्होंने लहरिया प्रिंट की पगड़ी सिर पर बांधी थी। केसरी रंग की इस पगड़ी पर हरी और पीली रंग की धारियां बनीं थी, जो देखने में काफी खूबसूरत लग रहीं थीं।
अब देखें 2019 का लुक
2019 में पीएम के दूसरे कार्यकाल का पहला स्वतंत्रता दिवस था। इस दिन उन्होंने छठवीं बार स्वतंत्रता दिवस का भाषण दिया था। 2019 में पीएम आधी बाजू के कुर्ते, पायजामे और केसरिया बॉर्डर वाले उपरने के साथ नजर आए थे।इस लुक के साथ भी उन्होंने उन्होंने पीले, लाल और हरे रंग से बनी लहरिया पैटर्न वाली पगड़ी पहनी थी। फर्क बस इतना है कि 2024 में उन्होंने जो साफा पहना है उसका प्रिंट काफी चौड़ा है, जबकि इसपर पतली धारियां बनी हैं।
लहरिया प्रिंट राजस्थान के पश्चिमी इलाकों के रेगिस्तानी रेत पर बहने वाली हवा से बनने वाली लहरों की प्रतीक है। यही वजह है कि लहरिया प्रिंट में कपड़े के ऊपर आड़ी-तिरड़ी लाइनें होती हैं, जो लहरों की तरह ही दिखती हैं। इस प्रिंट में जिन रंगों का इस्तेमाल होता है, वो भारत की भव्यता को दर्शाता है। शुभ कामों में लहरिया प्रिंट के कपड़े पहनना अच्छा माना है, क्योंकि लहरिया प्रिंट में जिन रंगों का का इस्तेमाल होता है, वो नई शुरूआत के लिए शुभ माने जाते हैं। इस पगड़ी को राजस्थान की शान भी कहा जाता है।
कब हुई थी इसे बनाने की शुरुआत
लहरिया प्रिंट को सबसे पहले 17वीं शताब्दी में ईजाद किया गया था। इसे तैयार करने के लिए टाई एंड डाई तकनीक का इस्तेमाल होता है। इसे काफी मेहनत से तैयार किया जाता है। 17वीं शताब्दी में इजाद होने के बाद 19वीं शताब्दी के अंत तक इसका इस्तेमाल राजस्थान के कई अलग-अलग हिस्सों में होने लगा। उस वक्त भी इसका इस्तेमाल राजघरानों के पुरुषों की पगड़ी बनाने के लिए किया जाता था। ये लहरिया प्रिंट सिर्फ एक डिजाइन नहीं है, इसके पीछे राजस्थान के राजघरानों की सभ्यता छिपी है।