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Rashtrapati Bhavan: 17 साल, 29 हजार कारीगर और 340 कमरों का आलीशन आशियाना, जानें राष्ट्रपति भवन की कहानी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Thu, 21 Jul 2022 11:04 AM IST
सार

राष्ट्रपति भवन महज एक इमारत नहीं जीता जागता उदाहरण है उस स्वाधीनता की लड़ाई का, जिसमें हमारे और आपके न जाने कितने अपनों ने खुद को बलिदान कर दिया। ये गवाह है आजादी की लड़ाई का। ये गवाह है देश की आजादी और गणतंत्र का।

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History of Rashtrapati Bhavan: 17 years and 340 rooms of luxurious house, know the story of Presidetial house
राष्ट्रपति भवन - फोटो : अमर उजाला
आज हम आपको एक कहानी बताएंगे। मुश्किल से तीन मिनट की ये कहानी आपको भारतीय इतिहास के कुछ पन्नों से रूबरू कराएगी। ये कहानी है दिल्ली की रायसीना पहाड़ियों पर बसे राष्ट्रपति भवन की। 


यह महज एक इमारत नहीं जीता जागता उदाहरण है उस स्वाधीनता की लड़ाई का, जिसमें हमारे और आपके न जाने कितने अपनों ने खुद को बलिदान कर दिया। ये गवाह है आजादी की लड़ाई का। ये गवाह है देश की आजादी और गणतंत्र का।

तो आइए बिना देरी किए कहानी पर आते हैं... जानते हैं कि ब्रिटिश हुकुमत के वायसराय के लिए खासतौर पर बने इस महल को कैसे तैयार किया गया? कैसे यह आजादी के बाद राष्ट्रपति भवन के रूप में तब्दील हुआ? 
 
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History of Rashtrapati Bhavan: 17 years and 340 rooms of luxurious house, know the story of Presidetial house
राष्ट्रपति भवन - फोटो : अमर उजाला
तो चलिए शुरू करते हैं कहानी...
बात 1911 की है। अंग्रेजों ने कोलकाता की जगह दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला किया। तब वह दिल्ली में एक ऐसी इमारत बनाना चाहते थे, जो आने वाले कई सालों तक एक मिसाल बने। अंग्रेजों ने इसके लिए रायसीना की पहाड़ियों को चुना। यहां उन्होंने वायसराय के लिए एक शानदार इमारत बनाने का फैसला किया।

इस इमारत का नक्शा तब के मशहूर आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस ने तैयार किया। लुटियंस ने हर्बट बेकर को 14 जून, 1912 को इस आलीशान इमारत का नक्शा बनाकर भेजा। जगह मिल गई। नक्शा तैयार हो गया और अब अंग्रेजों ने काम शुरू कर दिया। सबसे पहले 1911 से 1916 के बीच ब्रिटिश हुकुमत ने रायसीना और मालचा गांवों के 300 लोगों की करीब चार हजार हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया।
 
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राष्ट्रपति भवन - फोटो : अमर उजाला
चार साल में महल बनाने का प्लान था, लग गए 17 साल
वायसराय के लिए महल को चार साल के अंदर तैयार करने की योजना थी, लेकिन जब शुरू हुआ तो इसे बनने में 17 साल लग गए। 1912 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1929 में खत्म हुआ। राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट बताती है कि इस इमारत बनाने में करीब 70 करोड़ ईंटों और 30 लाख पत्थरों का इस्तेमाल किया गया। 29 हजार से ज्यादा कारीगर इसके लिए लगाए गए थे। सभी ने मिलकर इसमें 340 कमरे तैयार किए। 

उस वक्त इसके निर्माण में 1 करोड़ 40 लाख रुपये खर्च हुए थे। राष्ट्रपति भवन में प्राचीन भारतीय शैली, मुगल शैली और पश्चिमी शैली की झलक देखने को मिलती है। राष्ट्रपति भवन का गुंबद इस तरह से बनाया गया कि ये दूर से ही नजर आता है। 
 
History of Rashtrapati Bhavan: 17 years and 340 rooms of luxurious house, know the story of Presidetial house
राष्ट्रपति भवन - फोटो : अमर उजाला
जब बनकर तैयार हुआ महल
1929 में जब ये आलीशान इमारत बनकर तैयार हुई तब भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन अपनी पत्नी के साथ इसमें पहुंचे। वह इसे देखकर चौंक गए। कहा जाता है कि उन्होंने इतनी भव्य इमरात को पूरी तरह से देखने के लिए हफ्ते भर का समय लिया। माउंटबेटन दूसरे नेताओं और अधिकारियों से यहीं मुलाकात करते थे। 

जब आजादी का आंदोलन तेज हुआ और अपने अंतिम चरण में पहुंचा तो इसी इमारत में  आजादी की इबारत लिखी गई। 15 अगस्त, 1947 को भारत की आजादी के साथ ही वायसराय हाउस भी नए युग में पहुंच गया। आजादी के बाद दो साल तक ये इमारत गर्वमेंट हाउस के नाम से जानी जाती रही। 
 
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महात्मा गांधी के साथ चक्रवर्ती राजगोपालाचारी - फोटो : अमर उजाला
आजाद भारत के पहले गर्वनर जनरल यहीं रहे
आजादी के बाद देश के पहले गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को रहने के लिए यही महलनुमा इमारत मिली। वह इसकी भव्यता और शानो-शौकत से परेशान हो गए। राजगोपालाचारी ने कुछ दिन बाद ही यहां से जाने का मन बना लिया, लेकिन प्रोटोकॉल के हिसाब से यह मुमकिन नहीं हो पाया। तब वह इसमें रहने की बजाय गेस्ट रूम में रहने लगे। 

26 जनवरी, 1950 को भारत गणतंत्र बना और देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बनाए गए। 1950 में गर्वमेंट हाउस को राष्ट्रपति भवन बदल दिया गया। राजेंद्र प्रसाद यहां रहने आए, लेकिन वह भी राष्ट्रपति भवन की शानो-शौकत को अपना नहीं पाए। उन्होंने भी राजगोपालाचारी की परंपरा को जारी रखते हुए गेस्टरूम में रहने का फैसला लिया। गेस्टरूम में रहने की परंपरा आज भी कायम है। 
 
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