{"_id":"5efc5f118ebc3e42e72b3726","slug":"know-about-ghatak-platoon-of-indian-army-how-they-perform-operatoin-know-all-history","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"भारतीय सेना के 'घातक कमांडो' क्यों हैं खास, कैसे अभियानों को देते हैं अंजाम, जानें पूरा इतिहास","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
भारतीय सेना के 'घातक कमांडो' क्यों हैं खास, कैसे अभियानों को देते हैं अंजाम, जानें पूरा इतिहास
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अनवर अंसारी
Updated Wed, 01 Jul 2020 03:32 PM IST
विज्ञापन
1 of 5
भारतीय सेना के कमांडो
- फोटो : indian army website
भारत और चीन के सैनिकों के बीच लद्दाख की गलवां घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से ही एशिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है। चीन ने कहा है कि वह अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देने के लिए बीस मार्शल आर्ट ट्रेनर तिब्बत भेज रहा है।
हांगकांग की मीडिया के अनुसार, चीनी मीडिया में तिब्बत भेजे जा रहे सेना के खास मार्शल आर्ट ट्रेनरों की खबरें सुर्खियों में बनी हुई हैं। सरकारी चैनल सीसीटीवी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि एंबो फाइट क्लब से जुड़े बीस फाइटर तिब्बत की राजधानी ल्हासा में रहेंगे।
हालांकि, चीनी मीडिया ने यह नहीं बताया कि ये ट्रेनर भारत से लगी सीमा पर तैनात सैनिकों को भी प्रशिक्षण देंगे या नहीं। लेकिन भारत में इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या मार्शल आर्ट ट्रेंड चीनी जवानों से लड़ने के लिए हमारे जवानों के पास ट्रेनिंग है?
विशेषज्ञों ने बताया है कि भारतीय सेना की हर इंफेंट्री में ऐसे जवान मौजूद हैं, जिन्हें बिना हथियारों के लड़ने का प्रशिक्षण दिया गया है और वो मार्शल आर्ट जैसी विधाओं में भी पारंगत हैं। सैनिकों के इस समूह को 'घातक प्लाटून' के नाम से जाना जाता है।
भारतीय सेना के कमांडो
- फोटो : indian army website
'घातक प्लाटून' की खासियत क्या है?
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने बताया, ये उन लोगों का प्लाटून होता है जो अपनी यूनिट के सबसे तगड़े जवान माने जाते हैं। इन लोगों को जूडो, कराटे किकबॉक्सिंग और मार्शल आर्ट जैसी तकनीक सिखाई जाती हैं। उन्होंने बताया कि लेकिन ऐसा नहीं है कि ये सैनिक सिर्फ बिना हथियारों के ही लड़ते हैं। हथियारों की भी इनके पास बेहतरीन ट्रेनिंग होती है।
सेना के एक रिटायर्ड वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, लोगों के बीच ये गलत धारणा है कि ये सैनिक सिर्फ बिना हथियारों के ही युद्ध में हिस्सा लेते हैं। लेकिन सच यह है कि इनके पास दूसरे सैनिकों की तरह हथियारों की भी ट्रेनिंग होती है। निहत्थे लड़ना इनकी एक अतिरिक्त खूबी है।
सेना के जानकारों ने बताया कि हर इंफेंट्री यूनिट के साथ ऐसे सैनिक मौजूद रहते हैं और चुनौतीपूर्ण अभियानों में इनकी मदद ली जाती है। सेना जब किसी मोर्चे पर तैनात होती है तो वह तरह के सैनिकों के साथ होती है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि कहीं केवल सिर्फ घातक कमांडो हैं या कहीं सिर्फ हथियारों से लड़ने वाले सैनिक। जिस तरह की परिस्थितियां होती है, उसके अनुसार सैनिकों को तैनात किया जाता है।
प्लाटून में चुना जाना जवान के लिए गर्व की बात
वहीं, 'घातक प्लाटून' में चुनाव के लिए उपलब्ध होने का फैसला खुद सैनिक का होता है। इन सभी लोगों में जो सबसे अच्छे सैनिक होते हैं, उन्हें प्लाटून में जगह दी जाती है।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने बताया, प्लाटून में चुना जाना किसी भी जवान के लिए गर्व की बात होती है, क्योंकि वे अपने यूनिट के सबसे तगड़े जवान माने जाते हैं। बिना हथियारों के लड़ने की काबिलियत के अलावा, उन्हें शूटिंग करने की, पानी, कचरे और दलदल जैसी मुश्किल जगहों पर जाने की ट्रेनिंग भी दी जाती है।
उन्होंने बताया कि इसके अलावा ये सैनिक कई दूसरी तरह की कठिन ट्रेनिंग से भी गुजरते हैं। यूनिट के सैनिकों को नक्शा समझने, कम राशन और दुर्गम जगहों पर रहने के लिए जीवन रक्षा प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
भारतीय सेना के कमांडो
- फोटो : indian army website
कौन होता है कमांडर?
प्रसाद के मुताबिक करगिल की लड़ाई और सर्जिकल स्ट्राइक में घातक प्लाटून ने अहम भूमिका निभाई थी और ये चीन के सैनिकों से लड़ने के भी काबिल हैं। उनके मुताबिक इस यूनिट का कमांडर एक अफसर रैंक का व्यक्ति होता है।
उन्होंने बताया, आमतौर पर कोई युवा कैप्टन या मेजर इसका कमांडर होता है। यूनिट में जेसीओ, हवलदार और नाइक रैंक के सैनिक भी होते हैं। ये सभी युवा लोग होते हैं। सबसे ज्यादा आवश्यक कमांडो का मजबूत और काबिल होना होता है।
भारतीय सेना के कमांडो
- फोटो : indian army website
घातक प्लाटून का इतिहास
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने बताया, चीन के साथ 1962 के युद्ध के बाद हर इंफेंट्री में एक प्लाटून नियुक्त किया गया था, जिसका नाम कमांडो प्लाटून होता था। एक प्लाटून में करीब 30 व्यक्ति होते हैं। उन्होंने बताया कि यूनिट के सबसे तगड़े युवा ऑफिसर को कमांडर चुना जाता था।
प्रसाद ने बताया कि उस दौर में कमांडो प्लाटून का काम यही होता था कि किसी ऐसी परिस्थिति में जब गुत्थमगुत्था होना पड़े या दुश्मन के पीछे जाना पड़े या कहीं घात लगाना पड़े, तो इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी।
उन्होंने बताया कि इसी वजह से 'कमांडो प्लाटून' का नाम बदल कर 'घातक प्लाटून' कर दिया गया और इनके कमांडरों को अधिक काबिल बनाने के लिए कई तरह की नई ट्रेनिंग दी जाने लगीं।
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे| Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
विज्ञापन
विज्ञापन
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।