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Ustad Zakir Hussain: तबले के अद्वितीय फनकार से जुड़ी स्मृतियां, याद कर भावुक हुए संगीत की दुनिया के दिग्गज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 17 Dec 2024 07:52 AM IST
सार
तबले के ताल गुरु थे उस्ताद जाकिर हुसैन। वह भारतीय संगीत के सिरमौर और दुनिया की अजीम शख्सियत थे। उन्होंने तीन पीढ़ियों के संगीतकारों के साथ तबले पर अपनी छाप छोड़ी। पंडित रवि शंकर के सितार के साथ तबले पर थाप दी, तो पंडित अजय चक्रवर्ती के गायन को भी सजाया और राकेश चौरसिया की बांसुरी को संवारा। उनके तबले की थाप अनंत काल तक गूंजती रहेगी...
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उस्ताद जाकिर हुसैन
- फोटो : अमर उजाला
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संगीत की जो विद्या है, वह बहुत तेज बहती हुई नदी है। जिस भी कलाकार के पास आप सीखने जाएंगे, वह यह कहेगा कि इस नदी से एक कप पानी निकालो, एक बाल्टी पानी निकालो या एक टैंकर पानी निकालो, लेकिन निकालना आपको ही है। यह आपकी प्रतिभा है। गुरु शिष्य को सिखाता नहीं है, शिष्य गुरु को सिखाने के लिए प्रेरित करता है। आप आते हैं शिष्य बनकर कि कल कुछ और सीखा था, आज कुछ और सीखेंगे, कल कुछ और सीखेंगे, परसों कुछ और सीखेंगे।
मेरे पिता ही मेरे गुरु थे...
वे कब पिता होते, कब गुरु, कब दोस्त- मेरे लिए ये सब आपस में मिले हुए हैं। दो दिन का था, पिता जी की गोद में मुझे दिया गया। हमारे यहां बच्चे के कान में अजान देने का रिवाज है, ढेर सारे लोगों के यहां मंत्र पढ़ने का रिवाज होगा, लेकिन मेरे पिता जी ने मेरे कान में तबले के बोल पढ़े। मां नाराज भी हुईं। कहा- ‘ये क्या है, आपको कुरान के बोल पढ़ने चाहिए।’ पिता जी ने कहा- ‘यही मेरा कुरान है, यही मेरी इबादत है।’ तब से उनकी रोज यह आदत थी कि वे घंटा-डेढ़ घंटा तबले के बोल पढ़ने लगते। मुझे तो कुछ समझ में क्या आता होगा, लेकिन मेरे कान में कुछ पढ़ा जाता था। यह कुछ वैसी ही कहानी है, जैसे अर्जुन ने अभिमन्यु की मां के जो बताया था, वह कहीं अभिमन्यु की स्मृति में रह गया। इस प्रकार उन्होंने मुझे तालीम दी थी।
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अपने पिता के साथ उस्ताद जाकिर हुसैन (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला / एजेंसी
वाद्य की इज्जत करें...
मेरे पिता जी हमेशा कहते थे कि यह सरस्वती है, इसकी इज्जत करो, इसे रास्ते की कोई चीज न समझो। कभी तबले के पास जूता न रखो, तबले पर कभी अपने कपड़े न रखो, उसको एक पूजा की चीज समझो। हर वाद्य में एक रूह है, एक आत्मा है। अगर आपको एक अच्छा कलाकार बनना है तो आपको उस वाद्य से इजाजत लेनी है कि वह वाद्य आपको स्वीकार करे। मैं 12 साल का था, तब से मैंने तबला बजाने का सफर शुरू किया था। मुंबई से जा रहे हैं, मुगलसराय में उतरकर ट्रेन बदल रहे हैं, पटना या कोलकाता जा रहे हैं। हम छोटे थे और इतने पैसे नहीं होते थे कि आरक्षण वगैरह करा सकें। उस समय बस यह था कि ट्रेन में घुसना है। लेकिन दिमाग में यह भी होता था कि पिता का आदेश है कि यह सरस्वती है, तो तबले को कोई धक्का भी नहीं पहुंचना चाहिए। तो सीट तो मिलती नहीं, अखबार बिछाकर नीचे बैठ जाता और गोद में तबला ले लेता, जिससे उसे धक्का न लगे।
उस्तादजी बेहद सरल इन्सान थे। उनका मन बाल सुलभ था। यह दुर्लभ तस्वीर 1980 के दशक में लखनऊ की है, जिसमें जाकिर रिक्शा चला रहे हैं और महान कथक नर्तक बिरजू महाराज पीछे बैठे हैं।
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Ustad Zakir Hussain Passed Away: उस्ताद जाकिर हुसैन नहीं रहे, 73 की उम्र में निधन | Amar Ujala |
- फोटो : self
तबला संगत का साज है...
तबला वादक को संगत करना आना जरूरी है, क्योंकि एकल तबला वादन तो आप आराम से कर लेंगे। जब आपकी तालीम होती है तो आपकी सोलो की तालीम होती है। आप सीखी हुई चीजें बजा देंगे और आपकी प्रशंसा हो जाएगी, लेकिन जब तक संगत करना नहीं आएगा, तब तक आप तबलिए नहीं बन सकते। आज आप श्रुति सडोलीकर के साथ तबला बजा रहे हैं और 10 दिन बाद अगर आपका किशोरी अमोनकर (अब दिवंगत) के साथ कार्यक्रम है तो आपकी संगत अलग होगी। आपको इसको सीखना होगा। आपको बंदिशों को जानना होगा, उनके भावों को जानना होगा। तबला वादक को गायन की समझ जरूरी है, वाद्य संगीत और नृत्य की समझ जरूरी है। उनकी बंदिशें, गतें याद होनी चाहिए। मैं पंडित रवि शंकर जी के साथ यात्रा पर था। मैं 17 साल का था। एक कार्यक्रम हुआ, दूसरा कार्यक्रम हुआ, मैंने रवि शंकर जी से पूछा कि कैसा हो रहा है? रवि शंकर जी ने कहा कि तुम मेरे साथ तबला बजाते हो, लेकिन मुझे देखते क्यों नहीं? यकीन करिए कि उस दिन जब शाम को कार्यक्रम हुआ, मैं रवि शंकर जी की ओर थोड़ा और घूमकर बैठ गया। उस दिन संगत की एक नई किताब खुल गई।
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पिता और गुरू के साथ परफॉर्म करते उस्ताद जाकिर हुसैन।
- फोटो : instagram: hcmaeofficial
तबले पर डमरू और शंख
कैलाश पर्वत पर शिव जी के डमरू से जो शब्द निकले थे, उसे गणेश जी ने लेकर ताल की जुबान पर बांधा था। वही शब्द हम सब आज बजाते हैं, क्योंकि गणेश जी हमारे गुरु देव हैं। उन्होंने जो पखावज के लिए लिखा था, वही अब तबले पर बजता है। कल्पना कीजिए, कैलाश पर्वत पर शिव जी का डमरू बज रहा है और उनके शिष्यगण शंख बजा रहे हैं, दोनों की एक साथ जो ध्वनि होगी तो क्या वातावरण होगा! यह एक कल्पना है, एक सेवा है, ऊर्जा है तबले में उस वातावरण की।
...उस्ताद जाकिर हुसैन
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