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चीन का धोखा और 1962 की गवाह गलवां, इस घाटी की खोज से लेकर ड्रैगन की हरकत तक सब कुछ जानिए

Tue, 16 Jun 2020 04:27 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Tue, 16 Jun 2020 04:27 PM IST
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India China News in Hindi: Ladakh galvan valley on which dispute between China
लद्दाख - फोटो : सोशल मीडिया

भारत और चीन के बीच का तनाव अब काफी बढ़ गया है। दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई है। इसमें भारतीय सेना के तीन जवान शहीद हो गए हैं। इसी के साथ एक बार फिर गलवां घाटी चीन की घिनौनी चाल की गवाह बनी है। सामरिक दृष्टि से यह इलाका बहुत महत्वपूर्ण है। इसका नामकरण लद्दाख के एक निवासी के नाम पर हुआ था। गुलाम रसूल गलवां ने वर्ष 1899 में ब्रिटेन के संयुक्त आयुक्त के साथ लेह से ट्रैकिंग कर दुरूह भौगोलिक क्षेत्र में नए रूट तलाशे। इसी दौरान गुलाम रसूल गलवां ने एक नदी की भी खोज की। गुलाम रसूल गलवां को इससे जबरदस्त ख्याति मिली।

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लद्दाख

इसके बाद से नदी का नाम गलवां और क्षेत्र का नाम गलवां घाटी पड़ गया। इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ है, जब किसी नदी का नाम किसी व्यक्ति के नाम से प्रचलित हो। वहीं चीन की सेना की हरकत देख लद्दाख के लोग भी हैरान हैं। लद्दाख के लोगों का कहना है कि चीन पहले भी जमीन हथियाने के लिए ऐसी गतिविधियों को अंजाम देता रहा है। लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रिंचन नामग्याल कहते हैं कि लद्दाख की सरहद देश की आजादी से पूर्व जहां तक थीं, वर्तमान में चीन उससे कहीं भीतर आकर काबिज है।

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लद्दाख - फोटो : सोशल मीडिया

सात दशक से चीन ने कभी सेना तो कभी चरवाहों को भेजकर जमीन कब्जाने की कोशिशें जारी रखी हैं। गलवां घाटी में इस बार जिस तरह का सैन्य जमावड़ा हो गया है, वह चीन की बड़ी तैयारी की ओर इशारा करता है। भारत को ड्रैगन की हरकतों पर हर हाल में लगाम लगानी होगी। लेह की अंजुमन इमामिया के अध्यक्ष अशरफ अली बारचा कहते हैं कि चीन के साथ भारत की नीति रक्षात्मक रही है। चीन इसी का फायदा उठाने की कोशिश करता है। उसके चरवाहे इस तरफ आते हैं। चीन की पीएलए इन चरवाहों की आड़ में पहले टेंट लगाती है और फिर हमारे क्षेत्र पर दावा ठोकती है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

उन्होंने कहा कि इस बार गलवां घाटी में चीन के सैनिकों का जमावड़ा है, जिसके जवाब में भारतीय सेना ने भी तैनाती बढ़ा दी है। बारचा के अनुसार सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग भी डरे हुए हैं। चीन को हर हाल में रोकना होगा। जम्मू-कश्मीर के इकलौते परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाना सिंह कहते हैं कि चीन जानता है कि भारत अब 1962 वाला देश नहीं है। गलवां घाटी के तनाव को युद्ध जैसे हालात की संज्ञा देना सही नहीं होगा। फौज को पता है किस हरकत का कैसे जवाब देना है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

सियाचिन में वर्ष 1987 के ऑपरेशन राजीव में अदम्य साहस दिखाकर परमवीर चक्र पदक हासिल करने वाले कैप्टन बाना सिंह ने कहा, ‘मैं व्यक्गित रूप से मानता हूं कि चीन की इस हिमाकत का रणनीतिक रूप से जवाब देना चाहिए। मुझे विश्वास भी है कि भारतीय फौज इसे लेकर पूरी तैयारी कर चुकी है।’

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