जब से कोरोना वायरस दुनिया में आया है, तब से लेकर एंटीबॉडी को लेकर चर्चाएं कुछ ज्यादा ही चल रही हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर एंटीबॉडी क्या होती है? दरअसल, किसी वायरस या बीमारी से जब शरीर संक्रमित होता है तो शरीर एक सुरक्षात्मक प्रोटीन का उत्पादन करता है, जिसे एंटीबॉडी कहा जाता है। कोरोना होने के बाद भी शरीर में एंटीबॉडी बनती हैं, लेकिन ये एंटीबॉडी आखिर कब तक वायरस से बचाव कर सकती हैं, इसको लेकर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। हालांकि ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि ये एंटीबॉडी चार से छह महीने तक शरीर में रहती हैं। अब इसी को लेकर एक नए शोध में यह दावा किया गया है कि कोरोना से संक्रमित होने के आठ महीने बाद तक इंसान के शरीर में कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडीज रहती हैं।
अध्ययन: कोरोना होने के बाद कितने महीने तक शरीर में रहती है एंटीबॉडी? शोधकर्ताओं ने बताया
यह अध्ययन इटली के आईएसएस नेशनल हेल्थ इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। अध्ययन में 162 कोरोना मरीजों को शामिल किया गया था, जो सिम्प्टोमैटिक यानी लक्षण वाले थे। ये मरीज पिछले साल कोरोना की वजह से गंभीर रूप से बीमारी पड़े थे और उन्हें इमरजेंसी रूम में रखा गया था। मार्च और अप्रैल 2020 में इनके ब्लड सैंपल लिए गए थे और फिर बाद में नवंबर में दोबारा उनका ब्लड सैंपल लिया गया, ताकि एंटीबॉडी की जांच की जा सके। हालांकि इनमें से करीब 29 मरीजों की मौत हो गई थी।
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि कोरोना संक्रमित होने के बाद अगले आठ महीनों तक अधिकतर मरीजों में कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडीज मौजूद थे। उनमें से सिर्फ तीन मरीज ही ऐसे थे, जिनके शरीर में बीमारी से लड़ने वाले एंटीबॉडीज नहीं पाए गए।
इस अध्ययन में दो तिहाई पुरुष शामिल थे और उनकी औसत उम्र 63 साल थी। इनमें से करीब 57 फीसदी मरीज ऐसे थे, जो पहले से ही किसी न किसी बीमारी से पीड़ित थे। इनमें ज्यादातर मरीज उच्च रक्तचाप और डायबिटीज के मरीज थे।
इस अध्ययन को 'नेचर कम्यूनिकेशन्स साइंटिफिक जर्नल' में हाल ही में प्रकाशित किया गया है। इसमें शोधकर्ताओं ने एक और खास जानकारी दी है कि जिन मरीजों में संक्रमण के 15 दिन में एंटीबॉडीज नहीं बनीं, उनके गंभीर रूप से बीमार पड़ने का जोखिम ज्यादा था।
स्रोत और संदर्भ:
Neutralizing antibody responses to SARS-CoV-2 in symptomatic COVID-19 is persistent and critical for survival
https://www.nature.com/articles/s41467-021-22958-8
अस्वीकरण नोट: यह लेख 'नेचर कम्यूनिकेशन्स साइंटिफिक जर्नल' में प्रकाशित अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। किसी भी तरह की बीमारी के लक्षण हों अथवा आप किसी रोग से ग्रसित हों तो अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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