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Diabetes Alert: डायबिटीज का हर चौथा मरीज भारत से, सेहत से लेकर जेब तक सबपर पड़ रहा इस बीमारी का असर

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Thu, 15 Jan 2026 02:37 PM IST
सार

  • द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया के एक चौथाई से ज्यादा डायबिटिक लोग भारत में रहते हैं।
  •  अमेरिका के बाद भारत दूसरा ऐसा देश है जिसे डायबिटीज के कारण सबसे ज्यादा आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। 

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diabetes capital of the world india faces second highest economic burden due to diabetes
भारत में डायबिटीज का प्रकोप - फोटो : Freepik.com

भारतीय आबादी में जिन क्रॉनिक बीमारियों के मामले सबसे तेजी से बढ़ते हुए देखे जा रहे हैं, उनमें डायबिटीज प्रमुख है। हाई ब्लड शुगर वाली ये समस्या यहां जिस गति से लोगों को अपना शिकार बनाती जा रही है, इसे देखते हुए भारत को 'डायबिटीज कैपिटल' कहा जाने लगा है। डायबिटीज सिर्फ खून में ग्लूकोज बढ़ने की समस्या नहीं है। धीरे-धीरे ये स्थिति आपकी आंखों, किडनी, लिवर, पाचन तंत्र और रोग प्रतिरोधक क्षमता सभी को नुकसान पहुंचाने लगती है। 



आंकड़े बताते हैं कि भारत में डायबिटीज एक बड़ी महामारी बनती जा रही है।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एक अनुमान के मुताबिक 18 साल से ज्यादा उम्र के 77 मिलियन (7.7 करोड़) लोग टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित हैं।
  • लगभग 2.5 करोड़ लोग प्रीडायबिटिक हैं जिन्हें भविष्य में डायबिटीज होने का ज्यादा खतरा है।
  • 50% से ज्यादा लोगों को अपनी डायबिटिक स्थिति के बारे में पता नहीं है, जिससे अगर इसका जल्दी पता लगाकर इलाज न किया जाए तो स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं।
  • डायबिटीज वाले वयस्कों में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा दो से तीन गुना ज्यादा होता है।

डायबिटीज की बीमारी न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा रही है, साथ ही इसके कारण आर्थिक बोझ भी बढ़ता जा रहा है।

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डायबिटीज के कारण बढ़ता खर्च - फोटो : Adobe Stock

डायबिटीज का आर्थिक बोझ 

डायबिटीज पर कौन से देश का कितना पैसा खर्च हो रहा है, इसके लेकर हाल ही में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के बाद भारत दूसरा ऐसा देश है जिसे डायबिटीज के कारण सबसे ज्यादा आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। भारत पर इस बीमारी का  बोझ 11.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है।
 

  • अमेरिका को सबसे ज्यादा 16.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च उठाना पड़ता है
  • वहीं चीन तीसरे नंबर पर है, जिसका खर्च 11 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। 


 नवंबर 2024 में द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया के एक चौथाई से ज्यादा डायबिटिक लोग भारत में रहते हैं।

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डायबिटीज के कारण बढ़ता खर्च - फोटो : Adobe stock photos

दुनिया की जीडीपी का 1.7% होता है डायबिटीज पर खर्च

ऑस्ट्रिया में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस और वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस के शोधकर्ताओं ने साल 2020 से 2050 तक 204 देशों में डायबिटीज के आर्थिक असर का हिसाब लगाया। नेचर मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, परिवार के सदस्यों द्वारा दी जाने वाली अनौपचारिक देखभाल को छोड़कर, कुल वैश्विक लागत लगभग 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है, जो दुनिया के सालाना सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 0.2 प्रतिशत है। 

विशेषज्ञों का अनुमान है कि अनौपचारिक देखभाल को शामिल करने पर यह राशि 152 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक हो सकती है जो दुनिया के सालाना जीडीपी का 1.7 प्रतिशत है।

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भारतीय लोगों में डायबिटीज की समस्या - फोटो : Freepik.com

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस में प्रोफेसर और अध्ययन के लेखक क्लॉस प्रेटनर कहते हैं, भारत और चीन के लिए, डायबिटीज पर होने वाला खर्च मुख्य रूप से इस रोग से प्रभावित बड़ी आबादी के कारण है, जबकि अमेरिका में उपचार की लागत के कारण खर्च अधिक हो रहा है। 

अध्ययन के सह-लेखक माइकल कुह्न कहते हैं यह इस बात का एक साफ उदाहरण है कि डायबिटीज जैसी पुरानी बीमारियों के लिए मेडिकल इलाज सिर्फ ज्यादा इनकम वाले देशों के लिए ही क्यों उपलब्ध है? अल्जाइमर रोग या कैंसर की तुलना में डायबिटीज का आर्थिक असर बहुत ज्यादा है।

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डायबिटीज की रोकथाम जरूरी - फोटो : Freepik.com

डायबिटीज की रोकथाम जरूरी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा, हेल्दी लाइफस्टाइल को बढ़ावा देना, नियमित रूप से व्यायाम और फिजिकल एक्टिविटी को लेकर लोगों को जागरूक करना और संतुलित आहार पर ध्यान देना डायबिटीज को रोकने और इसके आर्थिक असर को कम करने का सबसे असरदार तरीका है।

टीम ने कहा कि व्यापक डायबिटीज स्क्रीनिंग प्रोग्राम के जरिए इस रोग का जल्दी पता लगाना, साथ ही समय पर इलाज उपलब्ध कराना भी जरूरी है ताकि डायबिटीज के कारण होने वाले खर्च को कम किया जा सके।




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स्रोत
The global macroeconomic burden of diabetes mellitus


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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