फोन में सैकड़ों नंबर हैं और सोशल मीडिया पर हजारों दोस्त, पोस्ट डालते ही लाइक और कमेंट की लाइन लग जाती है पर असल जिंदगी में खालीपन है। अगर आपके साथ भी ये दिक्कत है तो यकीन मानिए आप अकेले नहीं है, ये समस्या दुनियाभर में करोड़ों लोग झेल रहे हैं। अकेलापन यानी लोनलीनेस वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती समस्या है, जिसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार सभी लोगों को अलर्ट कर रहे हैं।
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सोशल मीडिया पर हजारों-लाखों फॉलोअर्स के बावजूद कई लोग अंदर से अकेलापन महसूस करते हैं। अकेलेपन तनाव, नींद और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है।
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अकेलापन का बढ़ता खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, आज का अकेलापन थोड़ा अजीब है। पहले अकेलेपन का मतलब अक्सर आसपास किसी का न होना समझा जाता था। अब भीड़ के बीच रहकर, ऑफिस में लोगों के साथ बैठकर और सोशल मीडिया पर लगातार जुड़े रहने के बावजूद इंसान खुद को अकेला महसूस कर सकता है। स्क्रीन पर चेहरे बहुत हैं, लेकिन दिल की बात कहने वाले कितने हैं, यह सवाल ज्यादा मायने रखता है।
- अकेलापन का सेहत पर गंभीर असर हो सकता है। लंबे समय तक सामाजिक जुड़ाव की कमी तनाव, नींद, मूड और जीवनशैली को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब इसे खतरनाक स्थिति बताते हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
मेडिकल विशेषज्ञ कहते हैं, इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में जहां पूरी दुनिया बस एक क्लिक पर जुड़ी नजर आती है, वहीं इंसान अकेला और अलग-थलग पड़ता जा रहा है।
- घंटों स्क्रीन से चिपके रहने और सोशल मीडिया स्क्रॉल करते रहने के कारण लोग इस कदर अकेलेपन के शिकार हो रहे हैं कि दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे एक वैश्विक महामारी मानने लगे हैं।
- ऑस्ट्रेलिया के जाने-माने लेखक पॉल डेली कहते हैं कि इंसानी दिमाग को खोखला करके टेक कंपनियां अमीर बनती जा रही हैं।
- लोग यह जानते हुए भी कि सोशल मीडिया उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है, इससे दूर नहीं हो पा रहे हैं।
युवा पीढ़ी अकेलेपन का सबसे ज्यादा शिकार
पॉल डेली कहते हैं, 25 वर्ष तक की युवा पीढ़ी इस अकेलेपन की लत की सबसे बड़ा शिकार है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यह पीढ़ी ऐसे माहौल में पली-बढ़ी है जहां लगातार ऑनलाइन रहना एक अनिवार्यता बन गया है। दूसरी तरफ, टेक कंपनियां खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में ऐसा एल्गोरिदम इस्तेमाल करती हैं, जिससे लोग इससे बाहर ही नहीं आ पाते। वह अपने आसपास के लोगों और समाज से कटकर अकेलेपन के शिकार होते जाते हैं।
70% से अधिक युवा फोमो यानी पीछे रह जाने के डर से देर रात तक स्क्रीन स्क्रॉल करते रहते हैं। न्यूरोसाइंस के मुताबिक, नोटिफिकेशन और लाइक्स दिमाग में डोपामाइन नामक हार्मोन रिलीज करते हैं, जो जुए या नशीले पदार्थों की लत की तरह ही होता है।
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स्रोत:
Loneliness Is More Dangerous Than Smoking 15 Cigarettes A Day
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