दुनियाभर में तेजी से बढ़ती नींद विकारों की समस्या के लिए अध्ययनकर्ताओं ने स्क्रीन टाइम बढ़ने को प्रमुख कारक माना है। मोबाइल-लैपटॉप जैसे स्क्रीन्स से निकलने वाली नीली रोशनी को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की सेहत के लिए हानिकारक माना गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कोविड-19 महामारी के बाद से लोगों को स्क्रीन टाइम काफी बढ़ा हुआ देखा गया है, जिसके कई प्रकार के दीर्घकालिक दुष्प्रभाव हो सकते हैं। इससे होने वाले खतरों से बचे रहने के लिए सभी आयु के लोगों को इसे कम करने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है।
Digital Detox: महाराष्ट्र के एक गांव ने की 'सेहतमंद पहल', इस प्रयास से आप भी पा सकते हैं संपूर्ण स्वास्थ्य लाभ
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डिजिटल डिटॉक्स के बारे में जानिए?
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब कुछ समय के लिए सभी प्रकार के स्क्रीन्स से दूरी बना लेना है। सांगली जिले के वडगांव के लोगों ने यह खास पहल की है। गांव के एक मंदिर से शाम 7 बजे एक सायरन बजता है, जो लोगों को अपने मोबाइल फोन और अन्य गैजेट्स, टेलीविजन सेट आदि को बंद करने का संकेत देता है। इस समय को लोग किताबें पढ़ने और एक दूसरे के साथ बात करने-समय बिताने के लिए प्रयोग में लाते हैं। दूसरा अलार्म 8.30 बजे बजता है जो डिजिटल डिटॉक्स अवधि की समाप्ति का संकेत होता है।
अध्ययनों में पाया गया है कि स्क्रीन से दूरी बनाने से कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य लाभ हो सकते हैं। आइए जानते हैं कि इस तरह के प्रयास को स्वास्थ्य विशेषज्ञ कितना फायदेमंद मानते हैं?
शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार
यूके स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ सफोल्क के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया कि स्क्रीन टाइम को कम करके कई प्रकार से अपने शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि मोबाइल पर अधिक समय बिताने के कारण लोगों की शारीरिक गतिविधि कम हो गई है जिसके कारण मोटापे का खतरा बढ़ता जा रहा है।
मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोगों के लिए प्रमुख कारण के तौर पर जाना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्क्रीन टाइम कम होने से बढ़ रही कई तरह की न्यूरोलॉजिकल स्वास्थ्य समस्याओं के खतरे को भी कम करने में भी लाभ मिल सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य में लाभ
फोन-टीवी और लैपटॉप आदि से दूरी बनाने की आदत को मानसिक स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक माना गया है। स्क्रीन टाइम बढ़ने से चिंता-तनाव और अवसाद की समस्या का खतरा भी बढ़ा हुआ देखा गया है। इसके अलावा इसका एक दुष्प्रभाव यह भी है कि ऐसे लोगों की सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी भी कम हो जाती है जिसके कारण भी मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर हो सकता है।
बच्चों में स्क्रीन टाइम बढ़ने को उनमें व्यवहार संबंधी समस्याओं का खतरा माना जाता है। डिजिटल डिटॉक्स जैसी पहल को स्वास्थ्य विशेषज्ञ बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानते हैं।
नींद की गुणवत्ता में होता है सुधार
स्क्रीन टाइम का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव लोगों के स्लीप शेड्यूल में गड़बड़ी के तौर पर देखा गया है। विशेषज्ञ कहते हैं सोने से कम से कम एक घंटे पहले अपने फोन को दूर रख दें, यह मस्तिष्क को आराम देने का तरीक है, इससे नींद विकारों को भी कम किया जा सकता है।
स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी स्लीप शेड्यूल को नुकसान पहुंचाती है। इस नीली रोशनी के कारण मस्तिष्क में हार्मोन्स के असंतुलन और इससे संबंधित विकारों का भी खतरा हो सकता है। डिजिटल डिटॉक्स से नींद की गुणवत्ता सुधरती है और यह कई प्रकार की अन्य संबंधित समस्याओं को कम करने में भी आपके लिए सहायक है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से प्राप्त जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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