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Alert: हाथ-पैर रहते हैं सुन्न, कंट्रोल में नहीं रहता शरीर? कहीं आपको मल्टीपल स्क्लेरोसिस तो नहीं हो गया

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Fri, 27 Mar 2026 08:11 PM IST
सार

मल्टीपल स्क्लेरोसिस सेंट्रल नर्वस सिस्टम की एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसके कारण शरीर का इम्यून सिस्टम नसों के चारों ओर मौजूद सुरक्षात्मक माइलिन शीथ पर अटैक कर देती है। इससे मस्तिष्क और शरीर के बीच चलने वाले सिग्नल बाधित हो जाते हैं। 

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मल्टीपल स्क्लेरोसिस की समस्या के बारे में जानिए - फोटो : Freepil.com

लाइफस्टाइल में गड़बड़ी से संबंधित बीमारियां वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए गंभीर चिंता का कारण बनी ही हैं, साथ ही बढ़ते ऑटोइम्यून रोगों को लेकर भी हेल्थ एक्सपर्ट्स काफी चिंतित हैं। ऑटोइम्यून डिजीज ऐसी स्थितियां है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों पर अटैक करके उन्हें नुकसान पहुंचाती है। ऑटोइम्यून बीमारियों को पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है, बस इसके लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है।



मल्टीपल स्क्लेरोसिस भी ऐसी ही एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी है जो सेंट्रल नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है। ये नसों के चारों ओर मौजूद सुरक्षात्मक माइलिन शीथ पर अटैक करती है। इससे मस्तिष्क और शरीर के बीच चलने वाले सिग्नल बाधित हो जाते हैं। संकेतों का आदान-प्रदान बाधित होने के कारण कई तरह की दिक्कतें हो सकती है। आमतौर पर इससे प्रभावित लोगों को थकान, सुन्न होने, देखने में दिक्कत और कमजोरी की समस्या हो सकती है।

अगर आपको भी शारीरिक संतुलन बनाने में कठिनाई होती है, मांसपेशियों में कमजोरी बनी रहती है तो सावधान हो जाना चाहिए। 

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सेंट्रल नर्वस सिस्टम की समस्या - फोटो : Freepil.com

मल्टीपल स्क्लेरोसिस की समस्या के बारे में जानिए

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक गंभीर और धीरे-धीरे बढ़ने वाली ऑटोइम्यून बीमारी है, जो दिमाग और रीढ़ की हड्डी यानी सेंट्रल नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है।
 

  • हमारे शरीर में नसों के चारों ओर मायलिन नाम की एक सुरक्षात्मक परत होती है। 
  • ये इलेक्ट्रिक तार के कवर की तरह काम करती है और दिमाग से शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक संदेशों को पहुंचाने में मदद करती है। 
  • मल्टीपल स्क्लेरोसिस में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से इसी मायलिन पर अटैक कर देती है। 
  • जब यह परत क्षतिग्रस्त हो जाती है तो नसों के माध्यम से संदेशों का प्रवाह धीमा या बाधित हो जाता है। 
  • यही कारण है कि इस बीमारी में अलग-अलग तरह के न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई देते हैं। 


समय रहते इस समस्या के लक्षणों की पहचान कर इसका इलाज कराना जरूरी हो जाता है।

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मांसपेशियों और नसों से संबंधित समस्याओं का खतरा - फोटो : Adobe Stock

आपको भी तो नहीं हो हो रहे हैं मल्टीपल स्क्लेरोसिस के लक्षण?

मल्टीपल स्क्लेरोसिस की समस्या के कारण आपकी नजर में बदलाव, मांसपेशियों में कमजोरी, हाथ-पैरों के सुन्न होना होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस के शिकार लोगों में डबल विजन होने का खतरा अधिक देखा जाता रहा है। इस बीमारी में लोगों को कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं और ये दिक्कतें इस बात पर निर्भर करती हैं कि दिमाग या रीढ़ की हड्डी का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है। 
 

  • शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन या झनझनाहट
  • शरीर का संतुलन गड़बड़ होना।
  • मांसपेशियों में कमजोरी या अकड़न रहना।
  • अत्यधिक थकान बना रहना।
  • याददाश्त और ध्यान में कमी
  • मूत्र संबंधी समस्याएं, अपने आप पेशाब तक हो जाने जैसी दिक्कतें।
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ऑटोइम्यून से संबंधित बीमारियों का जोखिम - फोटो : Adobe stock

ये बीमारी होती क्यों है?

क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट के मुताबिक इस बीमारी के कारणों को अभी तक समझा नहीं जा सका है। यह बीमारी आमतौर पर 20 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में अधिक देखी जाती है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में इसका खतरा अधिक देखा जाता है।
 

  • स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिन लोगों के परिवार में यह बीमारी पहले से मौजूद है, उनमें इसका जोखिम थोड़ा बढ़ जाता है।
  •  विटामिन डी की कमी, धूम्रपान, कुछ वायरल संक्रमण जैसे एप्सटीन-बार वायरस भी जोखिम कारक माने गए हैं।



इसे ठीक कैसे किया जाता है?

मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि इस समस्या का अभी तक कोई पक्का इलाज नहीं है, लेकिन दवाओं और इलाज के माध्यम से आपके लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है। बीमारी को नियंत्रित करने के लिए डिजीज मॉडिफाइंग थेरेपी और दवाएं दी जाती हैं, जो इम्यून सिस्टम की असामान्य प्रतिक्रिया को कम करने में मदद करती हैं। 

शरीर में विटामिन डी का लेवल ठीक बनाए रखना, धूम्रपान से बचना, संतुलित आहार लेना और नियमित व्यायाम आपके लिए मददगार हो सकती है। फिजियोथेरेपी और साइकोथेरेपी से मरीज की जीवन गुणवत्ता को सुधारने में मदद मिल सकती है।





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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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