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World TB Day: दवा और इलाज मौजूद फिर भी क्यों नहीं रुक रही टीबी? टीबी मुक्त भारत में कहां आ रही बाधा

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Tue, 24 Mar 2026 07:51 PM IST
सार

भारत से टीबी को खत्म करने में कई बड़ी चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं। टीबी के मामलों का भारी बोझ (दुनिया भर के मामलों का 26%), कुपोषण, जांच में देरी, दवाओं के प्रति प्रतिरोधी टीबी सभी लोगों के लिए चुनौतियां बढ़ाती जा रही है।

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भारत में टीबी का खतरा - फोटो : Amarujala.com

भारत ने पिछले एक दशक में मेडिकल क्षेत्र में अपना डंका बजवाया है। आधुनिक शोध, मेडिकल क्षेत्र में नवाचार के जरिए समय रहते कोरोना की वैक्सीन तैयार करना हो या फिर व्यापक प्रयास से पोलियो जैसी बीमारी पर जीत हासिल करना, दुनियाभर ने भारत का लोहा माना है। पर ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) की बीमारी भारत के लिए अब भी बड़ी चिंता का कारण बनी हुई है। साल 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया था पर अब भी न सिर्फ बड़ी संख्या में संक्रमित सामने आ रहे हैं बल्कि भारत टीबी के बड़े बोझ वाला देश बना हुआ है।



डब्ल्यूएचओ ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार 2024 में भारत में लगभग 27.1 लाख लोग टीबी से संक्रमित पाए गए और 3 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत में टीबी अभी भी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है।

भारत में टीबी को लेकर लगातार व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाते रहे हैं, इसके इलाज के लिए करागर दवाएं उपलब्ध हैं, फिर क्यों देश टीबी से जंग नहीं जीत पा रहा है? आइए इसके कारणों को समझ लेते हैं।

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फेफड़ों की बीमारी, टीबी - फोटो : Adobe Stock

टीबी रोग के बारे में लोगों को जागरूक करने, टीबी की वैश्विक महामारी और इस बीमारी को खत्म करने के प्रयासों को और तेज करने के उद्देश्य से हर साल 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। 


पहले इस बीमारी के बारे में जान लीजिए

ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) फेफड़ों को संक्रमित करने वाली बीमारी है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी में इसका खतरा देखा जा रहा है।
 

  • टीबी एक संक्रामक बैक्टीरियल रोग है जो आमतौर पर खांसी, छींक या बोलने के दौरान हवा में फैलने वाले बैक्टीरिया से फैलता है। 
  • भीड़भाड़ वाले इलाकों, वेंटिलेशन की कमी और कुपोषण जैसी स्थितियों में यह तेजी से फैल सकता है।
  • तीन हफ्तों से ज्यादा समय तक खांसी रहना, बलगम आना और कुछ मामलों में बलगम से खून आना टीबी का आम संकेत माना जाता है। 
  • मरीजों को हल्का बुखार, पसीना आने, वजन कम होने, भूख न लगने और लगातार कमजोरी महसूस होने जैसी दिक्क्तें भी बनी रहती हैं। 
  • समय रहते टीबी के लक्षणों की पहचान हो जाए और टीबी के दवाओं की कोर्स पूरी की जाए तो इस रोग को आसानी से ठीक किया जा सकता है।
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टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य कैसे होगा संभव - फोटो : Adobe Stock

भारत में लगातार रिपोर्ट किए जाते रहे हैं मामले 

भारत में टीबी के मामले लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं जो टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य के लिए भी बड़ी चुनौती हैं।

अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस तरह से मिजोरम में टीबी से हुई मौतों ने पिछले 6 साल का रिकॉर्ड तोड़ा है। 2025 में मिजोरम में कुल 145 लोगों की तपेदिक (टीबी) से मौत हुई, जो छह वर्षों में सबसे ज्यादा मौतें हैं। इससे पहले 2020 में 31 लोगों की मौत हुई, जबकि 2021 में यह संख्या बढ़कर 46, 2022 में 87, 2023 में 119 और 2024 में 136 हो गई थी। 

इससे पहले 13 दिसंबर 2024 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने लोकसभा में बताया था कि भारत में टीबी के मामलों की दर कम हुई है।

साल 2015 में प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 237 लोगों को ये बीमारी थी जो 2023 में 17.7 प्रतिशत घटकर प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 195 हो गई है। टीबी से होने वाली मौतों में भी 21.4 प्रतिशत की कमी आई है, जो 2015 में प्रति लाख जनसंख्या पर 28 से घटकर 2023 में प्रति लाख जनसंख्या पर 22 हो गई है।

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टीबी के जंग में कहां आ रही है बाधा - फोटो : Adobe Stock

आखिर टीबी पर जीत में बाधा कहां आ रही है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, टीबी की रोकथाम और इलाज के लिए व्यापक अभियान चलाए जा रहे हैं लेकिन कई चुनौतियां हैं जो इस बीमारी को खत्म करने में बाधा डाल रही हैं। 
 

  • भारत की विशाल जनसंख्या के कारण टीबी का बोझ बहुत अधिक है। दुनिया के सभी टीबी मामलों में से लगभग 25 % भारत से हैं और यह देश अभी भी सबसे अधिक मामलों वाला देश है।
  • भारत में दवा-प्रतिरोधी टीबी के बढ़ते मामले भी चिंता का कारण बने हुए हैं। जब मरीज पूरे इलाज को समय पर पूरा नहीं करता या गलत दवा लेता है, तो बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधक बन जाते हैं। इससे इलाज कठिन हो जाता है।
  • ग्रामीण, आदिवासी और कई इलाकों में जांच सुविधा की कमी के कारण मरीजों में देर से बीमारी का पता चल पाता है जहां से इलाज मुश्किल हो जाता है।
  • कुपोषण, स्वास्थ्य-जागरूकता की कमी और सामाजिक कलंक के चलते कई लोग बीमारी को छिपाते हैं या इलाज पूरा नहीं करते, जिससे संक्रमण फैलता रहता है।




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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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