क्या सेक्स में दिलचस्पी न होना एक बीमारी है?
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फिट, अनफिट होने से एसेक्शुअलिटी का कोई नाता नहीं
फिट, अनफिट होने से एसेक्शुअलिटी का कोई नाता नहीं
एसेक्शुअलिटी इंडिया एक ऑनलाइन पोर्टल है जो भारत के एसेक्शुअल लोगों को अपने जैसे दूसरे लोगों से जुड़ने का मौका मुहैया कराता है।बीबीसी से बात करते हुए पूर्णिमा ने बताया कि फिलहाल एसेक्शुअलिटी के ज़्यादातर मामले बड़े शहरों में सामने आ रहे हैं।
पूर्णिमा के मुताबिक, एसेक्शुअलिटी का मतलब यह नहीं है कि ऐसे लोग सेक्स नहीं कर सकते। शारीरिक तौर पर पूरी तरह फिट होने के बावजूद ऐसा हो सकता है कि किसी को सेक्स में कोई रुचि न हो और ये ऐसे शख़्स के लिए बिल्कुल सामान्य है।
शारीरिक संबंध के चार चरण
शारीरिक संबंध के चार चरण
सेक्शुअल मेडिसिन के सलाहकार और पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर प्रकाश कोठारी इस राय से इत्तेफाक रखते हैं। उनका कहना है कि ये जेनेटिक स्ट्रक्चर है। बाकी यौन रुझानों की तरह ये भी पैदाइशी होता है।
बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर कोठारी ने बताया कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि एसेक्शुअल लोग हमबिस्तर नहीं हो सकते या बच्चे पैदा नहीं कर सकते लेकिन उन्हें इसकी ख़्वाहिश ही नहीं होती।डॉक्टर कोठारी के मुताबिक, शारीरिक संबंध के चार चरण होते हैं - ख़्वाहिश, अराउजल, प्रवेश और क्लाइमेक्स।
एसेक्शुअल लोगों में पहला चरण यानी इच्छा ही नहीं होती इसलिए अगर शारीरिक संबंध बनाएं भी जाए तो एसेक्शुअल पार्टनर का सहयोग मिलना मुश्किल होता है।
मशहूर क्लीनिकल साइकॉलॉजिस्ट अरूणा ब्रूटा बताती हैं कि जरूरी नहीं कि सेक्स में दिलचस्पी न होने का हर मामला एसेक्शुअलिटी से जुड़ा हो।
किस वजह से सेक्स रुचि पर होता है असर
किस वजह से सेक्स रुचि पर होता है असर
डॉक्टर ब्रूटा के मुताबिक, कई बार लाइफस्टाइल से जुड़े डिसऑर्डर जैसे हॉर्मोनल असंतुलन, थायरॉइड, डायबिटीज के चलते या शुक्राणुओं की कमी की वजह से भी सेक्स की रुचि पर असर पड़ सकता है। अगर आपको लगे कि ऐसा कुछ हो सकता है, तो किसी यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें।
अगर सारे टेस्ट नॉर्मल आते हैं तो किसी साइकॉलॉजिस्ट से मिलकर पर्सनैलिटी टेस्ट करवाएं। यौन रुझान जानने का यह एक कारगर तरीका है। एक बार एसेक्शुअलिटी तय हो जाने पर उस शख़्स को सामान्य महसूस कराने में सबसे अहम भूमिका परिवार की होती है।
डॉ ब्रूटा ने बताईं ये सलाहें...
डॉ ब्रूटा ने दी ये सलाह...
एसेक्शुअल व्यक्ति को बुरा-भला न कहें। उसके साथ मारपीट न करें। उसकी शख़्सियत को स्वीकार करें।
उसे अपनी पहचान को अपनाने में मदद करें। उसमें आत्मविश्वास जगाएं।
उसका मजाक न उड़ाएं। न ही किसी और को ऐसा करने दें।
उसकी स्थिति को समझें, उसकी बात सुनें और उसके मन में कोई हीन भावना न आने दें।
कभी-कभार खुद की नई पहचान के साथ तालमेल बैठाने के संघर्ष में, ऐसे लोग थोड़े मूडी या एग्रेसिव हो जाते हैं। कुछेक मामलों में डिप्रेशन या बाय-पोलर डिसऑर्डर भी देखा गया है। ऐसे में उनका साथ न छोड़ें और पूरा इलाज करवाएं।