वट सावित्री व्रत का है बड़ा महत्त्व, सुहागिन महिलाएं ऐसे करें पूजा
शास्त्रों के अनुसार पीपल वृक्ष के समान वट वृक्ष यानी बरगद का वृक्ष भी विशेष महत्व रखता है। पुराणों के अनुसार - वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु व अग्रभाग में शिव का वास माना गया है। अत: ऐसा माना जाता है कि इसके नीचे बैठकर पूजन व व्रतकथा आदि सुनने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह वृक्ष लम्बे समय तक अक्षय रहता है, इसलिए इसे अक्षयवट भी कहते हैं। जैन और बौद्घ भी अक्षयवट को अत्यंत पवित्र मानते हैं। जैनों का मानना है कि उनके तीर्थकर भगवान ऋषभदेव ने अक्षयवट के नीचे बैठकर तपस्या की थी। प्रयाग में इस स्थान को ऋषभदेव तपस्थली या तपोवन के नाम से जाना जाता है।
वटवृक्ष कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है, सबसे पहले यह वृक्ष अपनी विशालता के लिए प्रसिद्ध है। दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो यह वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक है, क्योंकि इसी वृक्ष के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ ने बुद्धत्व को प्राप्त किया और भगवान बुद्ध कहलाए। बोध ज्ञान को प्राप्त करने के कारण इस अक्षय वटवृक्ष को बोधिवृक्ष भी कहते हैं, जो गया तीर्थ में स्थित है। इसी तरह वाराणसी में भी ऐसे वटवृक्ष हैं जिन्हें अक्षयवट मानकर पूजा जाता है।वटवृक्ष वातावरण को शीतलता व शुद्धता प्रदान करता है और आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह अत्यंत लाभकारी है। अत: वट सावित्री व्रत के रूप में वटवृक्ष की पूजा का यह विधान भारतीय संस्कृति की गौरव-गरिमा का एक प्रतीक है और इसके द्वारा वृक्षों के औषधीय महत्व व उनके देवस्वरुप का भी ज्ञान होता है।
- महिलाएं सुबह उठकर स्नान कर नए वस्त्र पहनें और सोलह श्रृंगार करें.
- अब निर्जला व्रत का संकल्प लें और घर के मंदिर में पूजन करें.
- अब 24 बरगद फल (आटे या गुड़ के) और 24 पूरियां अपने आंचल में रखकर वट वृक्ष पूजन के लिए जाएं.
- अब 12 पूरियां और 12 बरगद फल वट वृक्ष पर चढ़ा दें.
- इसके बाद वट वृक्ष पर एक लोट जल चढ़ाएं.
- अब फल और मिठाई अर्पित करें.
- इसके बाद धूप-दीप से पूजन करें.
- अब वट वृक्ष में कच्चे सूत को लपटते हुए 12 बार परिक्रमा करें.
