Lohri 2026: पंजाब की ठंडी रात, अग्नि की लपटें, लोकगीतों की गूंज और अरदास की शांति—लोहड़ी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, कृतज्ञता और सामुदायिक एकता का उत्सव है। खेतों की मेहनत, प्रकृति का आभार और गुरु की शरण—तीनों का संगम लोहड़ी को खास बनाता है। लोहड़ी 13 जनवरी 2026 (मंगलवार) को मनाई जाएगी। यह पर्व हर वर्ष मकर संक्रांति से एक दिन पहले आता है और शीत ऋतु के विदा होने तथा रबी फसल के स्वागत का संकेत देता है।
Gurudwara in Delhi: पंजाब से हिमाचल तक, लोहड़ी पर कौन से गुरुद्वारे जरूर जाएं?
Lohri 2026 Famous Gurudwara in India: 13 जनवरी 2026 को लोहड़ी मनाई जा रही है। इस मौके पर भारत के कुछ प्रसिद्ध गुरुद्वारे के दर्शन करने जा सकते हैं।
भारत के प्रसिद्ध गुरुद्वारे जहां लोहड़ी पर जा सकते हैं
श्री हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर), अमृतसर
सिख धर्म का सबसे पवित्र गुरुद्वारा अमृतसर में स्थित है। श्री हरमंदिर साहिब को स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है, क्योंकि इसपर सोने की परत चढ़ी है। इसकी नींव संत हजरत मियां मीर ने रखी थी और निर्माण गुरु अर्जन देव जी ने कराया था। लोहड़ी पर यहां की शांति और भव्यता अलग ही अनुभव देती है। शबद-कीर्तन, सरोवर की परिक्रमा और विशाल लंगर आस्था को नई ऊर्जा देते हैं।
तख्त श्री केसगढ़ साहिब, आनंदपुर साहिब
पंजाब के आनंदपुर साहिब में स्थित सिखों के पांच तख्तों में से एक है। ये खालसा पंथ की जन्मभूमि है। यहां गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में खालसा की नींव रखी थी। लोहड़ी के दिन यहां विशेष दीवान और अरदास होती है। इतिहास और आस्था का दुर्लभ संगम देखने को मिलता है।
गुरुद्वारा बंगला साहिब, दिल्ली
दिल्ली का हृदय। लोहड़ी पर यहां हजारों श्रद्धालु मत्था टेकते हैं। सरोवर और लंगर सेवा मन को स्थिर कर देती है। गुरुद्वारा बंगला साहिब नई दिल्ली में स्थित एक प्रमुख और पवित्र सिख गुरुद्वारा है, जो 8वें सिख गुरु श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी से जुड़ा है और ऐतिहासिक रूप से राजा जय सिंह के बंगले में बना है, जहां गुरु हरकृष्ण जी ने चेचक महामारी के दौरान मानवता की सेवा की थी। यह अपने पवित्र सरोवर और विशाल लंगर के लिए प्रसिद्ध है।
गुरुद्वारा शीशगंज साहिब, दिल्ली
गुरु तेग बहादुर जी की शहादत से जुड़ा यह स्थान लोहड़ी पर त्याग और सत्य की याद दिलाता है। दिल्ली के चांदनी चौक में स्थित इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा को नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर की शहादत की याद में 1783 में बघेल सिंह द्वारा बनवाया गया था।