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इंदौर की गेर: राजवाड़े के ईर्द-गिर्द होने वाला आयोजन कैसे बना इंदौर की पहचान, रोचक रहा है इंदौरी गेर का इतिहास

Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Sat, 07 Mar 2026 06:35 AM IST
सार

Indore Rangpanchami Celebration : इंदौर में रंगपंचमी पर निकलने वाली ‘गेर’ की परंपरा होलकर काल से चली आ रही है। पहले राजवाड़ा में महाराजा दरबारियों पर रंग डालते थे। समय के साथ गेर का विस्तार हुआ। बैंड-बाजे, झांकियों और रंगों के साथ यह उत्सव आज इंदौर की प्रमुख सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।

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Rangpanchami: The event held around the Rajwara has become the identity of Indore, read the history of Ger.
रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर अब इंदौर की पहचान है। - फोटो : अमर उजाला
मालवा का शहर जिसकी महक और उत्सवी परंपरा का प्राचीन इतिहास रहा है। होली-रंगपंचमी या गणेश उत्सव झांकियों की चर्चा देश भर में होती है। गैर शब्द का अर्थ दूसरा या पराया होता है, लेकिन उसे भी रंग लगाना ही इंदौर में रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर का उद्देश्य होता है। रविवार को इंदौर में रंगारंग गेरें निकाली जाएंगी और इसमें शामिल होने वाला हर शख्स रंग में डूबा और भीगा रहेगा। रंगपंचमी का आयोजन रियासत दौर में राजवाड़े के आसपास ही होता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरूप विस्तृत होता गया। 


महाराजा डालते थे रंग
होलकर रियासत काल में रंग पंचमी महोत्सव बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता था। वन विभाग एक महीने पहले से रंग पंचमी के लिए प्राकृतिक फूलों का संग्रह कर रंग बनाने का कार्य करता था। सर्वप्रथम महाराजा होलकर दरबार में अपने दरबारियों पर रंग-गुलाल डालते थे। रंग पंचमी के अवसर पर गीत-संगीत के भव्य आयोजन और पशुओं की लड़ाई मुख्य आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी। शहर के कई अखाड़ों में इस दौरान पहलवानों के मध्य कुश्ती के आयोजन भी होते थे, राजवाड़ा रंगपचमी के उत्सव का मुख्य केंद्र होता था।

होलकर कालीन प्रकाशित गजेटियर और अन्य पुस्तकों में उल्लेख है कि होली और रंगपंचमी का आयोजन सभी लोग मिलकर करते थे। राजवाड़े में राजपरिवार के सदस्य चांदी और अन्य दरबारी पीतल और तांबे की पिचकारियों से होली खेलते थे।

 
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इंदौर की गेर में लाखों लोग शामिल होते हैं। - फोटो : फाइल फोटो
अग्नि शमन वाहनों से उड़ाते थे रंग
महाराजा यशवंतराव होलकर (कार्यकाल-1926-1948) वयस्क नहीं थे, इसलिए राजकाज का संचालन एक परिषद द्वारा किया जाता था। 1931 में प्रकाशित एलसी धारीवाल के इंदौर स्टेट गजेटियर के अनुसार 1924 में मैरी वेदर हेट फील्ड मोटर इंजन फायर ब्रिगेड के लिए क्रय किए थे। महाराजा अल्प-वयस्क थे, इसलिए उनकी जिद के कारण फायर ब्रिगेड के वाहनों से टेसू 'पलाश' के फूलों से बना रंग उड़ाया गया था।

टोरी कॉर्नर से गेर ने लिया नया रूप 
टोरी कॉर्नर की गेर लगभग 75 वर्ष से अधिक समय से आयोजित हो रही है। यह गेर का आयोजन करने वाली प्रथम संस्था थी। इसके सफल आयोजन के बाद अन्य संस्थाओं द्वारा गेर का आयोजन किया जाने लगा। इस तरह टोरी कॉर्नर इंदौर की रंगपंचमी की सांस्कृतिक विरासत का मुख्य केंद्र रहा है। यहां पर कई सभाएं, कवि सम्मेलन हुआ करते थे। महाकवि नीरज और शायर बेकल उत्साही समेत कई नामचीन कवि और शायर यहां होने वाले कवि सम्मेलनों में शामिल होते थे। कई प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इसी चौराहे पर हुआ करते थे। 

 
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पिछली गेर में मुख्यमंत्री मोहन यादव भी शामिल हुए थे। - फोटो : फाइल फोटो
चौराहे पर रखा रहता था रंगों से भरा कढ़ाव
50 के दशक में कुछ युवा साथी हाथ ठेले और टंकियों में रंग, गुलाल भर कर उड़ाते थे और चौराहे पर एक बड़ा लोहे का कढ़ाव रंग का भर कर रखते थे। रंगपंचमी के दिन वहां से जो भी गुजरता था उसे उठाकर उसमें पटक देते थे, ताकि वह रंगों से सराबोर हो जाए। इसके बाद टोरी कॉर्नर के युवाओं की यह टीम मस्ती करते हुए नगर के प्रमुख बाजारों से निकलती और रंग-गुलाल उड़ाते हुए घूमती थी। धीरे-धीरे इसी मस्ती की टीम ने गेर का रूप ले लिया। 

 
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इंदौर की गेर को मिले विस्तार - फोटो : अमर उजाला
बाबूलाल गिरि रहे गेर के अगुआ
टोरी कॉर्नर की बाबूलाल गिरि द्वारा आयोजित गेर का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा धीरे-धीरे अन्य गेरें भी शामिल होती गईं। इनमें नरसिंह बाजार की नवरंग गेर, संगम कॉर्नर, रसिया कॉर्नर राजमोहल्ला शामिल हुईं। संयोगितागंज मंडी में रंगपचमी उत्सव, बड़ा सराफा में रंगपंचमी पर भव्य उत्सव और गेरों के स्वागत का कार्यक्रम आयोजित होता था। गेर में बैंड-बाजे, नगाड़े, हाथी, ऊंट, बैलगाड़ी और ट्रैक्टरों पर नृत्य करती मंडलियां रहती थीं। सराफा में गेरों के स्वागत की साठ के दशक में भव्य परंपरा थी।  

 
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कहां से कहां तक पहुंच गई इंदौर की गेर परंपरा - फोटो : अमर उजाला
रंगपंचमी पर कई बार मंडराए संकट के बादल 
विश्व भर में कोरोना महामारी की वजह से वर्ष 2020 से 2023 तक लगातार तीन वर्ष गेर का आयोजन नहीं हो सका था। इससे पूर्व भी भारत-चीन युद्ध 1962 में गेर पर संकट के बादल मंडराए थे, लेकिन 1963 में गेर का आयोजन हुआ। युद्ध के कारण इंदौर के रंग बाजार में रंगों की बिक्री काफी कम हुई थी। नगर की जनता ने देश हित में रंगों पर व्यय की जाने वाली राशि दान दे दी थी। 1971 में भारत पाक युद्ध के बाद 1972 में होली और रंगपंचमी पर सभी वर्गों ने हिलमिलकर उत्सव मानाने की अपील की थी। वर्ष 1974 में नगर के प्रथम महापौर रहे स्व. लक्ष्मणसिंह चौहान के निधन के कारण टोरी कॉर्नर की गेर नहीं निकाली गई थी। आपातकाल के दौर में गेर देर से आरंभ हुई और जल्दी समाप्त हो गई थी। 

 
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