स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में वागड़ अंचल (बांसवाड़ा-डूंगरपुर-प्रतापगढ़) का योगदान विशिष्ट और प्रेरणादायक रहा है। अंग्रेजी शासन और तत्कालीन रियासतों के सत्ताधीशों से संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों ने न केवल राजनीतिक आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, बल्कि सामाजिक कुरीतियों को मिटाने और शिक्षा के प्रसार में भी अहम भूमिका निभाई।
{"_id":"689d7eaa11651e13520a93ac","slug":"independence-day-special-struggle-of-vagad-in-india-s-freedom-movement-know-details-in-hindi-2025-08-14","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"Independence Day Special: स्वतंत्रता संग्राम में वागड़ का संघर्ष, जहां लहू से लिखी गई आजादी की कहानी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Independence Day Special: स्वतंत्रता संग्राम में वागड़ का संघर्ष, जहां लहू से लिखी गई आजादी की कहानी
न्यूज डेस्क अमर उजाला बांसवाड़ा
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Thu, 14 Aug 2025 11:44 AM IST
सार
देश की आजादी की लड़ाई में वागड़ अंचल की भूमिका सिर्फ राजनीतिक संघर्ष तक सीमित नहीं रही। मानगढ़ की रक्तरंजित पहाड़ी से लेकर शिक्षा, सामाजिक बदलाव और पहली जन सरकार के गठन तक यहां की धरती ने आजादी के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।
विज्ञापन
स्वतंत्रता संग्राम में वागड़ का संघर्ष
- फोटो : अमर उजाला
Trending Videos
वागड़ में प्रजामण्डल के सदस्य
- फोटो : अमर उजाला
तात्या टोपे की यात्रा और क्रांति की चिंगारी
1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे अगस्त और दिसंबर, 1857 में दो बार बांसवाड़ा आए। दूसरी बार उन्होंने बांसवाड़ा को घेरकर जीत हासिल की। इस जीत ने पूरे क्षेत्र में क्रांति की मशाल जलाई, जिसकी ऊर्जा आजादी मिलने तक महसूस की गई। इसी प्रेरणा से आदिवासियों से लेकर अन्य समाजों के युवा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े।
ये भी पढ़ें: Jaipur News: जोधपुर में 79वां राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा करेंगे ध्वजारोहण
1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे अगस्त और दिसंबर, 1857 में दो बार बांसवाड़ा आए। दूसरी बार उन्होंने बांसवाड़ा को घेरकर जीत हासिल की। इस जीत ने पूरे क्षेत्र में क्रांति की मशाल जलाई, जिसकी ऊर्जा आजादी मिलने तक महसूस की गई। इसी प्रेरणा से आदिवासियों से लेकर अन्य समाजों के युवा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े।
ये भी पढ़ें: Jaipur News: जोधपुर में 79वां राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा करेंगे ध्वजारोहण
विज्ञापन
विज्ञापन
सेवा संघ डूंगरपुर के कार्यकर्ता, वर्ष 1938-39
- फोटो : अमर उजाला
मानगढ़ का नरसंहार- रक्त से सनी पहाड़ी
तत्कालीन समय में शोषित भीलों को संगठित करने में गोविंद गुरु ने अग्रणी भूमिका निभाई। स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रभावित होकर उन्होंने 'सम्प सभा' की स्थापना की। इसके माध्यम से धर्म और समाज सुधार आंदोलन चलाकर आदिवासियों में नई चेतना जगाई।
यह जागरूकता अंग्रेजों के लिए खतरे की घंटी बनी। अप्रैल 1913 में गोविंद गुरु को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। रिहा होने के बाद उन्होंने मानगढ़ पहाड़ी पर डेरा जमाया और राजनीतिक, धार्मिक व सामाजिक जागरण की अलख जगाई। 17 नवंबर 1913 को अंग्रेजों ने यहां अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। पूरी पहाड़ी लाशों से भर गई, रक्त से लाल हो गई। इस घटना को आज 'मानगढ़ का नरसंहार' कहा जाता है।
सामाजिक समरसता और शिक्षा का अभियान
मानगढ़ की घटना के बाद भी आंदोलन थमा नहीं। वागड़ के गांधी भोगीलाल पंड्या ने अशिक्षा को मिटाने, सामाजिक समरसता और आदिवासियों के शैक्षणिक उत्थान के लिए काम शुरू किया।
1932 में बाबा लक्ष्मणदास और मदनसिंह तोमर के सहयोग से हरिजन सेवक समिति की स्थापना की गई और माणिक्यलाल वर्मा ने वागड़ सेवा मंदिर की स्थापना कर रात्रि पाठशालाओं से हरिजनों व आदिवासियों को शिक्षा से जोड़ना शुरू किया। 15 मार्च 1938 को भोगीलाल पंड्या ने सेवा संघ की स्थापना की, जिसके जरिए आदिवासियों को शिक्षा, कृषि में रुचि, औजार उपलब्ध कराने और सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के अभियान चलाए गए। गौरीशंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी और बाबा लक्ष्मणदास जैसे सेनानियों ने भी इस रचनात्मक कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
तत्कालीन समय में शोषित भीलों को संगठित करने में गोविंद गुरु ने अग्रणी भूमिका निभाई। स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रभावित होकर उन्होंने 'सम्प सभा' की स्थापना की। इसके माध्यम से धर्म और समाज सुधार आंदोलन चलाकर आदिवासियों में नई चेतना जगाई।
यह जागरूकता अंग्रेजों के लिए खतरे की घंटी बनी। अप्रैल 1913 में गोविंद गुरु को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। रिहा होने के बाद उन्होंने मानगढ़ पहाड़ी पर डेरा जमाया और राजनीतिक, धार्मिक व सामाजिक जागरण की अलख जगाई। 17 नवंबर 1913 को अंग्रेजों ने यहां अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। पूरी पहाड़ी लाशों से भर गई, रक्त से लाल हो गई। इस घटना को आज 'मानगढ़ का नरसंहार' कहा जाता है।
सामाजिक समरसता और शिक्षा का अभियान
मानगढ़ की घटना के बाद भी आंदोलन थमा नहीं। वागड़ के गांधी भोगीलाल पंड्या ने अशिक्षा को मिटाने, सामाजिक समरसता और आदिवासियों के शैक्षणिक उत्थान के लिए काम शुरू किया।
1932 में बाबा लक्ष्मणदास और मदनसिंह तोमर के सहयोग से हरिजन सेवक समिति की स्थापना की गई और माणिक्यलाल वर्मा ने वागड़ सेवा मंदिर की स्थापना कर रात्रि पाठशालाओं से हरिजनों व आदिवासियों को शिक्षा से जोड़ना शुरू किया। 15 मार्च 1938 को भोगीलाल पंड्या ने सेवा संघ की स्थापना की, जिसके जरिए आदिवासियों को शिक्षा, कृषि में रुचि, औजार उपलब्ध कराने और सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के अभियान चलाए गए। गौरीशंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी और बाबा लक्ष्मणदास जैसे सेनानियों ने भी इस रचनात्मक कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डूंगरपुर में 4 अप्रैल 1946 को प्रजामण्डल के अधिवेशन में सम्मिलित सदस्य
- फोटो : अमर उजाला
प्रजामंडल का गठन और संघर्ष
बाबा लक्ष्मणदास, धूलजी भाई भावसार, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर और भूपेंद्रनाथ द्विवेदी ने शिक्षा प्रचार, हरिजन उद्धार और जिलों की दशा सुधारने का कार्य किया। 1930 में चिमनलाल मालोत ने शांत सेवा कुटिर की स्थापना कर राजनीतिक चेतना का प्रसार किया।
1943 में प्रजामंडल का गठन हुआ, जिसमें धूलजी भाई, मणिशंकर, सिद्धिशंकर झा, मोतीलाल, दिला भगत, सेवा मछार, दीपा भगत आदि सक्रिय रहे। जब तत्कालीन महारावल ने प्रजामंडल की सभाओं पर रोक लगाई, तो नगर में हड़ताल हुई। पाबंदी हटने के बाद, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी मुंबई से आकर बांसवाड़ा की राजनीति में सक्रिय हुए, जिससे प्रजामंडल को मजबूती मिली।
बाबा लक्ष्मणदास, धूलजी भाई भावसार, चिमनलाल मालोत, मणिशंकर नागर और भूपेंद्रनाथ द्विवेदी ने शिक्षा प्रचार, हरिजन उद्धार और जिलों की दशा सुधारने का कार्य किया। 1930 में चिमनलाल मालोत ने शांत सेवा कुटिर की स्थापना कर राजनीतिक चेतना का प्रसार किया।
1943 में प्रजामंडल का गठन हुआ, जिसमें धूलजी भाई, मणिशंकर, सिद्धिशंकर झा, मोतीलाल, दिला भगत, सेवा मछार, दीपा भगत आदि सक्रिय रहे। जब तत्कालीन महारावल ने प्रजामंडल की सभाओं पर रोक लगाई, तो नगर में हड़ताल हुई। पाबंदी हटने के बाद, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी मुंबई से आकर बांसवाड़ा की राजनीति में सक्रिय हुए, जिससे प्रजामंडल को मजबूती मिली।
विज्ञापन
प्रजामंडल के कार्य के दौरान भोगीलाल पंड्या, हरिदेव जोशी और गौरीशंकर उपाध्याय
- फोटो : अमर उजाला
पहली जन-सरकार का गठन
राजनीतिक जागरण से प्रभावित होकर शासक ने विधानसभा चुनाव करवाए। प्रजामंडल ने 45 में से 35 सीटें जीतीं और उस उत्तरदायी सरकार में भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी मुख्यमंत्री बने। मोहनलाल त्रिवेदी विकास मंत्री, नटवरलाल भट्ट राजस्व मंत्री, चतरसिंह जागीरदारों के प्रतिनिधि बनाए गए। यह मंत्रिमंडल 18 दिन तक कार्यरत रहा था।
महिलाओं का संघर्ष
आजादी की लड़ाई में महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। शकुंतला देवी और विजया बहन भावसार का नाम इनमें प्रमुख हैं। प्रजामंडल के सहयोगी संगठन महिला मंडल का नेतृत्व विजया बहन ने किया। 24 फरवरी 1946 को हुए जनांदोलन में, प्रधानमंत्री मोहनसिंह मेहता के बंगले के घेराव में महिलाओं ने जुलूस निकालकर आजादी की मांग बुलंद की।
आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे भारत के लिए वागड़ का इतिहास केवल अतीत नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत है, जहां क्रांति, शिक्षा, सामाजिक बदलाव और समानता के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया गया।
राजनीतिक जागरण से प्रभावित होकर शासक ने विधानसभा चुनाव करवाए। प्रजामंडल ने 45 में से 35 सीटें जीतीं और उस उत्तरदायी सरकार में भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी मुख्यमंत्री बने। मोहनलाल त्रिवेदी विकास मंत्री, नटवरलाल भट्ट राजस्व मंत्री, चतरसिंह जागीरदारों के प्रतिनिधि बनाए गए। यह मंत्रिमंडल 18 दिन तक कार्यरत रहा था।
महिलाओं का संघर्ष
आजादी की लड़ाई में महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। शकुंतला देवी और विजया बहन भावसार का नाम इनमें प्रमुख हैं। प्रजामंडल के सहयोगी संगठन महिला मंडल का नेतृत्व विजया बहन ने किया। 24 फरवरी 1946 को हुए जनांदोलन में, प्रधानमंत्री मोहनसिंह मेहता के बंगले के घेराव में महिलाओं ने जुलूस निकालकर आजादी की मांग बुलंद की।
आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे भारत के लिए वागड़ का इतिहास केवल अतीत नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत है, जहां क्रांति, शिक्षा, सामाजिक बदलाव और समानता के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया गया।
