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देवताओं को नमन, संभालते हैं ट्रैफिक, तंबाकू-बीड़ी व पेड़ कटान पर प्रतिबंध

अमीचंद भंडारी, अमर उजाला, खराहल (कुल्लू) Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Sat, 12 Oct 2019 05:32 PM IST
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international kullu dussehra 2019 story of devi devta
जुआणी देव - फोटो : अमर उजाला

कुल्लू दशहरा में हर देवता की रुतबे के हिसाब से भूमिका तय होती है। ऐसा सदियों से हो रहा है। कोई न्याय का देवता है तो कोई ट्रैफिक का जिम्मा संभालता है। मां हिडिंबा राजपरिवार की दादी कहलाती हैं तो कुछ देवता ब्यास नदी को पार नहीं करते। रथयात्रा मां भेखली के इशारे से तो लंका पर चढ़ाई देवियों की अनुमति से होती है।  तंबाकू-बीड़ी व पेड़ कटान पर प्रतिबंध के अलावा खेती के काम और रेडियो-टीवी भी लोग देव आदेश पर ही सुनते या देखते हैं।

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माता त्रिपुरा - फोटो : अमर उजाला

कल्लू घाटी में 2000 से ज्यादा देवी-देवता हैं। इनमें से 350 के करीब देवताओं की दशहरा में आने की परंपरा रही है। दशहरे और देव समाज में देवताओं की रुतबे के हिसाब से भूमिका रहती है। किसी देवता को न्याय के लिए जाना जाता है तो कोई जमीन जायदाद से संबंधित मामले देखते हैं। घाटी के धूमल नाग को ट्रैफिक का देवता कहा जाता है। कुल्लू दशहरा में हजारों-लाखों की भीड़ को नियंत्रित करना और अधिष्ठाता देव भगवान रघुनाथ के लिए रास्ता बनाना उनका काम है। देवता के दायीं व बायीं ओर, आगे-पीछे कौन चलेगा सब सदियों से तय है। यहां तक कि अगर एक देवता ने दूसरे देवता से मिलना है तो पहले उनसे समय लेना पड़ता है। बिना पूछे मिल भी नहीं सकते। हर किसी का स्थान, रास्ता, काम-काज, भूमिका और जिम्मेदारी तय है।

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देवता खुड़ीजल - फोटो : अमर उजाला

शायद इसी लिए देवभूमि में सदियों से यह परंपराएं आज भी कायम हैं। मनाली की देवी हिडिंबा की कुल्लू दशहरा में अहम भूमिका है। माता हिडिंबा के बिना दशहरा उत्सव की कल्पना नहीं की जा सकती। हिडिंबा राजपरिवार की दादी कहलाती हैं। देवी का राजमहल में विशेष स्थान है, जहां पर रथ विराजमान होता है। देवी के रथ मैदान में पहुंचने के बाद ही भगवान रघुनाथ की शोभायात्रा शुरू होती है। दशहरा में यातायात की पूरी व्यवस्था हलाण के देवता धूमल नाग के पास रहती है। रघुनाथ की पूजा और परिक्रमा के दौरान कोई रुकावट न आए इसका विशेष ध्यान रखते हैं।

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बिजली महादेव - फोटो : अमर उजाला

देवता किसी भी शख्स को घेरे के अंदर नहीं आने देते। देवता रुष्ट हुए तो लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर खदेड़ते हैं। कुल्लू दशहरा में पांच देवता हाजिरी तो भरते हैं लेकिन ब्यास नदी को पार नहीं करते। मलाणा के देवता ऋषि जमदग्नि, जाणा के जीव नारायण, सौर के देवता सरवल नाग, तादला के देवता शुक्री नाग और सोयल के देवता आजीमल ब्यास नदी के पार ही डेरा जमाए रहते हैं। लंका दहन के बाद देवता वहीं से अपने देवालय लौट जाते हैं।

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- फोटो : अमर उजाला

सैंज घाटी के कशु नारायण न्याय के देवता हैं। यहां सच और झूठ का पर्दाफाश होता है। बिजली महादेव और जुआणी महादेव रघुनाथ की रथ यात्रा में सदियों से बायीं ओर चलते हैं। पहले नंबर पर बिजली महादेव और दूसरे नंबर पर जुआणी महादेव रथ यात्रा में चलते हैं। देव समागम में कुल्लू के दर्जनों देवी-देवता भाग नहीं लेते हैं। कुल्लू जिला की भुवनेश्वरी माता, माता जगन्नाथी भुवनेश्वरी पुईद आधे रास्ते में पहुंच कर भगवान रघुनाथ का अभिवादन करती हैं। दोनों देवियों की अनुमति से रघुनाथ की आराधना और लंका पर चढ़ाई होती है। सदियों से सारी फाटी के कशु नारायण, फलाणी नारायण, लगवैली के भगवान कुष्ण और देवी फुंगणी, माहुटी नाग, बडाग्रां के बीरनाथ दशहरा में नहीं आते हैं।

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