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MahaKumbh 2025: महाकुंभ का अमृत कुंभ से क्या है संबंध? जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथा

Wed, 08 Jan 2025 07:15 AM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति मेहरा Updated Wed, 08 Jan 2025 07:15 AM IST
सार

हिंदू धर्म में कुंभ मेले का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह पर्व करोड़ों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है और सनातन संस्कृति की महानता को दर्शाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि महाकुंभ का अमृत कुंभ से क्या संबंध है।

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MahaKumbh 2025 Kumbh Mela Ki Katha In Hindi know amrit kumbh story
क्या है अमृत कुंभ? - फोटो : Amar Ujala
Kumbh Mela Ki Katha In Hindi: हिंदू धर्म में कुंभ मेले का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह पर्व करोड़ों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है और सनातन संस्कृति की महानता को दर्शाता है। मान्यता है कि करोड़ों वर्ष पूर्व देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जो अमृत कुंभ निकला था, उसके अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर गई थीं। इन्हीं स्थानों पर हर 12 वर्ष में कुंभ मेले का आयोजन होता है। प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक ये चार प्रमुख स्थान हैं, जहां कुंभ का आयोजन किया जाता है। वर्ष 2025 में यह महापर्व प्रयागराज में 13 जनवरी से 26 फरवरी तक आयोजित होगा।

 

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MahaKumbh 2025 Kumbh Mela Ki Katha In Hindi know amrit kumbh story
ganga mahakumbh - फोटो : adobestock
महाकुंभ का अमृत कुंभ से क्या है संबंध?
पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कुंभ लेकर आए थे, तब देवताओं और दानवों के बीच अमृत प्राप्ति को लेकर संघर्ष छिड़ गया। भगवान विष्णु ने इस संघर्ष को रोकने और अमृत को सुरक्षित रखने के लिए मोहिनी का रूप धारण किया। उन्होंने अमृत कलश को सुरक्षित रखने के लिए इंद्रदेव के पुत्र जयंत को सौंपा। जयंत अमृत कुंभ को लेकर आकाश मार्ग से चले, लेकिन दानवों ने उनका पीछा किया। इस दौरान अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर गईं। ये बूंदें प्रयागराज में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर, हरिद्वार में गंगा नदी में, उज्जैन में क्षिप्रा नदी में और नासिक में गोदावरी नदी में गिरीं। इन्हीं स्थानों पर कुंभ मेले की परंपरा शुरू हुई।
 
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ganga mahakumbh - फोटो : adobestock

कुंभ मेला हर 12 साल में आयोजित होता है, जबकि हर 6 साल में अर्धकुंभ का आयोजन किया जाता है। कुंभ पर्व का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मेले में संत-महात्मा, ऋषि-मुनि, आस्थावान श्रद्धालु और पर्यटक बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

Mahakumbh 2025: जानें किन दो ग्रहों की स्थिति से किया जाता है महाकुंभ के स्थान का चयन

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ganga mahakumbh - फोटो : adobestock
कुंभ स्नान का महत्व हिंदू धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। मान्यता है कि कुंभ में स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, कुंभ मेला आध्यात्मिक ज्ञान, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। यहां कई आध्यात्मिक और धार्मिक सभाएं आयोजित होती हैं, जिनमें साधु-संतों के प्रवचन, योग साधना और विभिन्न अनुष्ठान शामिल होते हैं।
 

Mahakumbh 2025: आखिर 12 वर्ष बाद ही क्यों होता है महाकुंभ का आयोजन? जानें इसका धार्मिक महत्व


 
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महाकुंभ 2025 - फोटो : Amar Ujala

प्रयागराज का कुंभ मेला विशेष रूप से संगम तट पर आयोजित होता है, जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम होता है। संगम का यह स्थान हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। कुंभ मेले के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु एकत्रित होकर पवित्र स्नान करते हैं और ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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