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संघर्ष की जमीन से उपजे हैं खेल के ये नगीने, आज राष्ट्रीय पुरस्कार से होंगे सम्मानित

Sat, 29 Aug 2020 07:23 AM IST
Rohit Ojha स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Rohit Ojha Updated Sat, 29 Aug 2020 07:23 AM IST
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Rohit Sharma to Rani Rampal These stars are emerged from the land of struggle will be honored with national awards
मरियप्पन थांगावेलु -रोहित शर्मा- रानी रामपाल - फोटो : सोशल मीडिया
खेल दिवस पर शनिवार को विभिन्न स्पर्धाओं के खिलाड़ी सम्मानित होंगे। आज ये खिलाड़ी शोहरत के शिखर पर हैं, कामयाबियां इनके कदम चूम रही हैं लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। इनकी सफलताओं के पीछे छिपा है कड़ा संघर्ष। साथ ही यह प्रेरणा भी कि कड़ी मेहनत, मजबूत हौसला और हार न मानने का जज्बा हो तो मंजिल ज्यादा दूर नहीं ...
Rohit Sharma to Rani Rampal These stars are emerged from the land of struggle will be honored with national awards
Mariappan Thangavelu - फोटो : सोशल मीडिया

मां ने सब्जी बेची, बेटे ने अखबार बेच कर पाया मुकाम
रियो पैरालंपिक में ऊंची कूद के स्वर्ण पदक विजेता मरियप्पन थांगावेलु का देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न तक पहुंचने का सफर काफी चुनौतीपूर्ण रहा है। तमिलनाडु में सेलम जिले के थांगावुल जब छोटे थे तो पिता परिवार को छोड़कर चले गए। घर और तीन बच्चों की जिम्मेदारी मां के ऊपर आ गई। मां ने घर चलाने के लिए सब्जी बेची तो बेटे मरियप्पन ने उनकी मदद के लिए सुबह लोगों के घर अखबार डाला तो दिन में दिहाड़ी की।

वह कहते हैं मैं दो से तीन किलोमीटर चलकर अखबार डालता था। इसके बाद निर्माणाधीन जगहों पर जाता था। मुझे हर दिन 200 रुपये मिलते थे। मां की मदद के लिए मुझे यह करना पड़ता था। थांगावेलु जब स्कूल में पढ़ते थे, तभी उन्हें खेलों के बारे में पता चला था। वर्ष 2013 में कोच आर सत्यनारायण ने राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उनकी प्रतिभा को देखा, तब वह 18 साल के थे। दो साल बाद थांगावेलु को बंगलूरू लाया गया और फिर इतिहास बन गया। उन्होंने न सिर्फ अपनी किस्मत बदली बल्कि मां, भाई और बहन की भी तकदीर बदल दी। साई ने उन्हें ग्रुप ए पद का कोच बना दिया है।

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रानी रामपाल - फोटो : सोशल मीडिया

पिता ने तांगा चलाकर बिटिया को बनाया रानी    
महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल को यहां तक पहुंचाने में उनके पिता रामपाल ने कड़ी मेहनत की है। पिता ने घोड़ा गाड़ी चलाकर बेटी के सपने को साकार किया। बेटी ने भी उन्हें निराश नहीं किया। रानी आज भी 13 साल पहले की वो घटना याद करके रो देती हैं जब उन्हें कोच ने फिटनेस का हवाला देकर जूनियर कैंप से निकाल दिया था। कुरुक्षेत्र के शाहबाद मारकंडा की रानी ने हार नहीं मानी और अपना मुकाम हासिल कर ही लिया। टीम को टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कराने में अहम भूमिका निभाने वाली 25 वर्षीय रानी देश का सर्वोच्च पुरस्कार पाने वाली पहली महिला और कुल तीसरी हॉकी खिलाड़ी हैं। रानी ने 241 मैचों में 134 गोल दागे हैं।  

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लक्खा सिंह - फोटो : सोशल मीडिया
पेट पालने के लिए टैक्सी चलाने वाले लक्खा की उम्मीदें को लगे पंख 
लक्खा सिंह ने कहा कि मैंने सारी उम्मीदें छोड़ दी थी। मुझे खुशी है कि आखिरकार उन्होंने मेरी उपलब्धियों को स्वीकार कर ही किया। पांच बार के राष्ट्रीय चैंपियन रहे मुक्केबाज लक्खा सिंह को परिवार पालने के लिए उधार की टैक्सी तक चलानी पड़ी। लॉकलाउन ने फिर उन्हें उसी मोड़ पर ला दिया। पंजाब के लुधियाना के बुर्ज लिटन गांव के 50 वर्षीय लक्खा का कहना है कि मेरे पास कोई चारा नहीं है। मुझे मेरे परिवार का ध्यान रखना है।

अटलांटा ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले लक्खा को इस बार प्रतिष्ठित लाइफ टाइम द्रोणाचार्य अवॉर्ड के लिए चुना गया है। उनका कहना इस अवॉर्ड ने मेरी उम्मीदों को नए पंख लगा दिए हैं। मेरी मुक्केबाजी अकादमी खोलने का सपना अब पूरा होने के करीब है। मैं उभरते हुए मुक्केबाजों को ट्रेनिंग देकर नई शुरुआत करूंगा। लक्खा ने 1994 होरोशिमा एशियाड में कांसा और 1994 में तेहरान एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में रजत पदक जीता था।
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श्रीलंका के खिलाफ 264 रन की पारी के दौरान रोहित शर्मा - फोटो : ट्विटर

रोहित के पास कभी स्कूल की फीस भरने के नहीं थे पैसे 
हिटमैन के नाम से मशहूर टीम इंडिया के सीमित ओवरों के उपकप्तान रोहित शर्मा का जीवन भी संघर्षों से अछूत नहीं रहा है। महाराष्ट्र के नागपुर में गुरुनाथ शर्मा के घर जन्मे रोहित को शुरू से ही क्रिकेट का शौक था। पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि उन्हें क्रिकेट सिखा पाते। चाचा और दोस्तों ने 50-50 रुपये एकत्र कर उनका दाखिला एक छोटी सी अकादमी में करवा दिया। इस दौरान उन्होंने एक क्रिकेट शिविर में हिस्सा लिया। वह कोच दिनेश लाड ने उनकी प्रतिभा का पहचाना और उनका दखिला अपने स्कूल स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल में करवा दिया। स्कूल महंगा था और उनके पास फीस  देने के पैसे नहीं थे। कोच ने अगले चार साल तक रोहित के लिए स्कॉलरशिप का इंतजाम करा दिया। इसके बाद रोहित ने पीछे मड़कर नहीं देखा। रोहित अब खेल रत्न बनने जा रहे हैं।

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