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सीएसआईओ ने ढूंढा समाधान: अब आसमान में कोई भी उड़ती चीज नहीं होगा धोखा, एआई बताएगा पक्षी है या ड्रोन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Thu, 11 Jun 2026 10:12 AM IST
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सार
मौजूदा विजन-आधारित ड्रोन डिटेक्शन सिस्टम अक्सर छोटे आकार के ड्रोन और पक्षियों के बीच अंतर करने में चूक जाते हैं, विशेषकर तब जब वस्तु काफी दूर हो या उसका आकार छोटा हो। ऐसे मामलों में सुरक्षा एजेंसियों को कई बार फॉल्स अलर्ट मिलते हैं।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : FreePik
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विस्तार
आसमान में उड़ती किसी वस्तु को देखकर यह तय करना हमेशा आसान नहीं होता कि वह पक्षी है या ड्रोन। यही भ्रम कई बार सुरक्षा एजेंसियों, एयरपोर्ट निगरानी तंत्र और संवेदनशील प्रतिष्ठानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
ड्रोन हमलों और सीमा पार से बढ़ती गतिविधियों के बीच अब चंडीगढ़ स्थित सीएसआईओ (सेंट्रल साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स ऑर्गेनाइजेशन) के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान खोजने का दावा किया है।
वैज्ञानिकों ने एक नई कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित तकनीक योलोबर्डड्रोन विकसित की है जो पक्षियों और ड्रोन के बीच अधिक सटीक अंतर करने में सक्षम है। शोध के दौरान इस मॉडल ने करीब 85 प्रतिशत तक पहचान और वर्गीकरण की सटीकता दिखाई है।
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वर्तमान समय में ड्रोन का उपयोग कृषि, डिलीवरी, सर्विलांस, आपदा प्रबंधन और रक्षा क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती यह भी है कि ड्रोन का इस्तेमाल जासूसी, संवेदनशील ठिकानों की निगरानी और हमलों के लिए भी किया जा सकता है। ऐसे में किसी संदिग्ध उड़ती वस्तु की समय रहते पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सीएसआईओ के वैज्ञानिक दपिंदर कौर, नीरज बटिश, अर्नव भावसार और शशि पोद्दार ने यह उन्नत एआई मॉडल विकसित किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार मौजूदा विजन-आधारित ड्रोन डिटेक्शन सिस्टम अक्सर छोटे आकार के ड्रोन और पक्षियों के बीच अंतर करने में चूक जाते हैं, विशेषकर तब जब वस्तु काफी दूर हो या उसका आकार छोटा हो। ऐसे मामलों में सुरक्षा एजेंसियों को कई बार फॉल्स अलर्ट मिलते हैं।
योलोबर्डड्रोन तकनीक इसी कमजोरी को दूर करने के लिए तैयार की गई है। इसमें एडेप्टिव एंड एक्सटेंडेड लेयर एग्रीगेशन (एएलएएन), मल्टी-स्केल प्रोग्रेसिव डुअल अटेंशन मॉड्यूल (एमपीडीए) और रिवर्स एमपीडीए जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया गया है। ये मॉड्यूल तस्वीरों में मौजूद वस्तुओं के आकार, आकृति, उड़ान व्यवहार और अन्य दृश्य संकेतों का गहराई से विश्लेषण करते हैं। इससे पक्षियों और ड्रोन के बीच अधिक सटीक वर्गीकरण संभव हो पाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में एयरपोर्ट सुरक्षा, सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी, सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। इससे संदिग्ध ड्रोन की समय रहते पहचान संभव होगी और पक्षियों को ड्रोन समझकर मिलने वाले फर्जी अलर्ट भी कम होंगे। साथ ही वीआईपी क्षेत्रों, महत्वपूर्ण सरकारी भवनों और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
ड्रोन हमलों और सीमा पार से बढ़ती गतिविधियों के बीच अब चंडीगढ़ स्थित सीएसआईओ (सेंट्रल साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स ऑर्गेनाइजेशन) के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान खोजने का दावा किया है।
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वैज्ञानिकों ने एक नई कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित तकनीक योलोबर्डड्रोन विकसित की है जो पक्षियों और ड्रोन के बीच अधिक सटीक अंतर करने में सक्षम है। शोध के दौरान इस मॉडल ने करीब 85 प्रतिशत तक पहचान और वर्गीकरण की सटीकता दिखाई है।
वर्तमान समय में ड्रोन का उपयोग कृषि, डिलीवरी, सर्विलांस, आपदा प्रबंधन और रक्षा क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती यह भी है कि ड्रोन का इस्तेमाल जासूसी, संवेदनशील ठिकानों की निगरानी और हमलों के लिए भी किया जा सकता है। ऐसे में किसी संदिग्ध उड़ती वस्तु की समय रहते पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सीएसआईओ के वैज्ञानिक दपिंदर कौर, नीरज बटिश, अर्नव भावसार और शशि पोद्दार ने यह उन्नत एआई मॉडल विकसित किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार मौजूदा विजन-आधारित ड्रोन डिटेक्शन सिस्टम अक्सर छोटे आकार के ड्रोन और पक्षियों के बीच अंतर करने में चूक जाते हैं, विशेषकर तब जब वस्तु काफी दूर हो या उसका आकार छोटा हो। ऐसे मामलों में सुरक्षा एजेंसियों को कई बार फॉल्स अलर्ट मिलते हैं।
योलोबर्डड्रोन तकनीक इसी कमजोरी को दूर करने के लिए तैयार की गई है। इसमें एडेप्टिव एंड एक्सटेंडेड लेयर एग्रीगेशन (एएलएएन), मल्टी-स्केल प्रोग्रेसिव डुअल अटेंशन मॉड्यूल (एमपीडीए) और रिवर्स एमपीडीए जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया गया है। ये मॉड्यूल तस्वीरों में मौजूद वस्तुओं के आकार, आकृति, उड़ान व्यवहार और अन्य दृश्य संकेतों का गहराई से विश्लेषण करते हैं। इससे पक्षियों और ड्रोन के बीच अधिक सटीक वर्गीकरण संभव हो पाता है।
बर्ड्रोन नाम से बड़ा डाटासेट तैयार
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने बर्ड्रोन नाम से एक बड़ा डाटासेट भी तैयार किया जिसमें हजारों हवाई तस्वीरें शामिल की गईं। इन तस्वीरों में छोटे आकार के और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में उड़ने वाले ऑब्जेक्ट्स को शामिल किया गया। इसी डाटासेट पर मॉडल को प्रशिक्षित और परीक्षण किया गया। परिणामों में पाया गया कि यह तकनीक विभिन्न परिस्थितियों में करीब 85 प्रतिशत तक सटीकता के साथ ड्रोन और पक्षियों की पहचान कर सकती है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में एयरपोर्ट सुरक्षा, सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी, सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। इससे संदिग्ध ड्रोन की समय रहते पहचान संभव होगी और पक्षियों को ड्रोन समझकर मिलने वाले फर्जी अलर्ट भी कम होंगे। साथ ही वीआईपी क्षेत्रों, महत्वपूर्ण सरकारी भवनों और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।