पंजाब में बदला चुनावी गणित: जिस पंथक वोट की ताकत से अकाली दल बना था सबसे मजबूत, अब हर दल कर रहा सेंधमारी
शिरोमणि अकाली दल लंबे समय से पंजाब के पंथक वोट पर एकछत्र कब्जा बनाए हुए था।2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी और बहबल कलां पुलिस गोलीबारी से अकाली दल को भारी झटका लगा। ऐसे में अब अकाली दल अपने मूल पंथक एजेंडे की ओर लौटने की कोशिश कर रहा है।
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पंजाब की राजनीति में पंथक वोट बैंक दशकों तक सत्ता का मार्ग तय करता रहा है, जिसने शिरोमणि अकाली दल को राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति बनाए रखा। राज्य की लगभग 58 फीसदी सिख आबादी में से 20 से 25 फीसदी मतदाता धार्मिक मुद्दों को मतदान का आधार मानते हैं।
पिछले एक दशक में यह पारंपरिक वोट बैंक पूरी तरह बिखर गया है। अब आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर), वारिस पंजाब दे, भाजपा और कांग्रेस भी इस वोट पर अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। पिछले तीन दशकों के चुनावी आंकड़ों में यह बदलाव साफ दिखता है।
बेअदबी और गोलीकांड से बदला राजनीतिक माहाैल
वर्ष 1997 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने 37.64 फीसदी वोट और 75 सीटें जीती थीं। 2007 में 37.09 फीसदी और 2012 में 34.73 फीसदी वोट के साथ पार्टी ने सत्ता में वापसी की। इससे पंथक राजनीति पर उसका दबदबा साबित हुआ। हालांकि, 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी और बहबल कलां पुलिस गोलीबारी ने राजनीतिक माहौल तेजी से बदला।
2017 विधानसभा चुनाव में अकाली दल का वोट प्रतिशत घटकर 25.24 फीसदी रह गया, पार्टी 15 सीटों पर सिमट गई। 2022 में यह गिरावट और तेज हुई, पार्टी 18.38 फीसदी वोट लेकर मात्र तीन सीटों पर आ गई।
भाजपा से अलग होने का हुआ नुकसान
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा से अलग लड़ने पर उसका वोट प्रतिशत 13.5 फीसदी तक पहुंच गया, पार्टी केवल बठिंडा सीट जीत सकी। इन चुनावी परिणामों ने अकाली दल का पारंपरिक पंथक आधार कई हिस्सों में बंटा हुआ दिखाया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2015 का बेअदबी विवाद और डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को माफी दिलाने का विवाद अकाली दल की विश्वसनीयता के लिए बड़ा झटका था।
परिवारवाद और विकास केंद्रित राजनीति के आरोपों ने भी उसके पारंपरिक कार्यकर्ताओं को निराश किया। आम आदमी पार्टी ने इस खाली जगह का लाभ उठाया। 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बेअदबी मामलों में न्याय दिलानेे का मुद्दा उठाया। भगवंत मान को स्थानीय जट्ट-सिख चेहरे के रूप में पेश कर माझा और मालवा क्षेत्रों में अकाली दल के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई।
वारिस पंजाब दे और अमृतपाल सिंह का उभार
2024 के लोकसभा चुनावों ने आम आदमी पार्टी के लिए समर्थन बनाए रखने की चुनौती दिखाई। खडूर साहिब से अमृतपाल सिंह की बड़ी जीत ने पंथक वोटों के नए ध्रुवीकरण का संकेत दिया। इसी बीच वारिस पंजाब दे संगठन और उसके प्रमुख अमृतपाल सिंह ने पंजाब की राजनीति में नया मोड़ ला दिया।
2024 लोकसभा चुनाव में जेल में रहते हुए अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 4.04 लाख वोट हासिल किए और करीब 1.97 लाख वोटों के रिकॉर्ड अंतर से जीत दर्ज की। यह जीत कट्टर धार्मिक और युवा पंथक मतदाताओं द्वारा नए नेतृत्व को स्वीकार करने का संकेत थी। वारिस पंजाब दे ने बंदी सिखों की रिहाई, नशा विरोधी अभियान और सिख पहचान जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा नुकसान शिरोमणि अकाली दल को हुआ है क्योंकि उसका पारंपरिक ग्रामीण जट्ट-सिख आधार तेजी से इस संगठन की ओर खिसक रहा है।
अन्य दलों की पंथक रणनीति
शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) लंबे समय से पंथक राजनीति की वैचारिक धुरी बना हुआ है। सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाला यह दल सिख अधिकारों, बंदी सिखों की रिहाई और धार्मिक स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर मुखर रहा है। 1989 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने पंजाब की छह सीटें जीती थीं और 2022 के संगरूर लोकसभा उपचुनाव में सिमरनजीत सिंह मान की जीत ने कट्टर पंथक वोट को उनके साथ दिखाया।
हालांकि 2024 के बाद अमृतपाल सिंह के उभार से इस दल के युवा समर्थकों का एक हिस्सा भी नई दिशा में जाता दिखाई दिया। उधर, भारतीय जनता पार्टी भी पहली बार धार्मिक संस्थाओं के माध्यम से पंथक वोट तक पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है। दमदमी टकसाल के प्रमुख बाबा हरनाम सिंह धूमा के साथ बढ़ती निकटता इसी प्रयास का हिस्सा है। भाजपा धार्मिक नेतृत्व के माध्यम से पंजाब में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है लेकिन धार्मिक समर्थन को वास्तविक वोट में बदलना उसके लिए बड़ी चुनौती है।
अकाली दल का वापसी का प्रयास और भविष्य
लगातार चुनावी झटकों के बाद शिरोमणि अकाली दल भी अब अपने मूल पंथक एजेंडे की ओर लौटने की कोशिश कर रहा है। पार्टी बंदी सिखों की रिहाई, पंजाब के नदी जल अधिकार और अकाल तख्त की स्वायत्तता जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप का विरोध भी उसके एजेंडे में है। अकाली दल के भीतर सुधार की मांग उठाने वाले नेताओं द्वारा शुरू की गई लहर का उद्देश्य बिखरे पंथक वोटों को एक मंच पर लाना था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज पंजाब में पंथक वोट किसी एक दल की स्थायी संपत्ति नहीं रह गया है। इसका एक हिस्सा आम आदमी पार्टी, एक हिस्सा शिरोमणि अकाली दल और बड़ा वर्ग वारिस पंजाब दे तथा शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) जैसे संगठनों की ओर आकर्षित हो रहा है। आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव में असली लड़ाई बिखरे पंथक वोट के सबसे बड़े हिस्से को जीतने की होगी क्योंकि सत्ता की चाबी उसी दल के हाथ में होगी जो पंथक और ग्रामीण सिख मतदाताओं का सबसे बड़ा भरोसा जीतेगा।