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भारत को सतर्क रहने की जरूरत: पश्चिम एशिया संकट और अमेरिका की भूमिका पर क्या बोले पूर्व राजदूत रमेश चंद्र?

सुरिंदर पाल, जालंधर Published by: Ankesh Kumar Updated Wed, 04 Mar 2026 06:20 AM IST
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सार

पंजाब के लाखों लोग खाड़ी देशों में नौकरी व धंधा कर रहे हैं। इसको लेकर बेलारूस में दूतावास अधिकारी रहे रमेश चंद्र ने अमर उजाला के साथ ख़ास बातचीत की। 
 

India needs to be cautious Former Ambassador Ramesh Chandra speaks on West Asia crisis and America role
पूर्व राजदूत रमेश चंद्र - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

रूस- यूक्रेन युद्ध के साथ साथ अब इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हो गया है। पूरे विश्व की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं और भविष्य क्या होगा? पंजाब के लाखों लोग खाड़ी देशों में नौकरी व धंधा कर रहे हैं। इसको लेकर बेलारूस में दूतावास अधिकारी रहे रमेश चंद्र ने अमर उजाला के साथ ख़ास बातचीत की। 

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प्रश्न- आपने चार दशकों तक भारतीय कूटनीति में सेवा दी। अपने अनुभव को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर-
मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर चीन स्थित भारतीय दूतावास, यमन, बेलारूस, स्कॉटलैंड, प्राग (चेक गणराज्य), यूक्रेन और रूस से जुड़े दायित्व निभाए। इन अनुभवों ने सिखाया कि कूटनीति केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि धैर्य, संवाद और संतुलन की कला है। भारत के मौजूदा विदेश मंत्री जयशंकर जैसे नेतृत्व के साथ काम करते हुए समझ आया कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शब्दों के साथ संकेतों की भी अहम भूमिका होती है।
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प्रश्न- आज पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को आप किस नजरिए से देखते हैं?
उत्तर-
यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा है। मुझे बार-बार गुरू गोबिंद सिंह की विरासत याद आती है। उनका ‘जफरनामा’ अन्याय के विरुद्ध नैतिक साहस का प्रतीक है। शक्ति का अर्थ आक्रामकता नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा है। यही सिद्धांत आज की विश्व राजनीति पर भी लागू होता है।

प्रश्न- अमेरिका की भूमिका को आप कैसे आंकते हैं, खासकर ट्रंप प्रशासन के संदर्भ में?
उत्तर-
ट्रंप की विदेश नीति में “माइट इज राइट” का स्वर स्पष्ट दिखा। चाहे कनाडा पर टिप्पणी हो, ग्रीनलैंड को लेकर बयान या वेनेजुएला पर सख्ती—इनसे शक्ति-आधारित वैश्विक व्यवस्था की झलक मिलती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय ढांचा केवल ताकत से नहीं चलता। यूएन और वियना कन्वेंशन जैसे तंत्र संतुलन बनाए रखने के लिए हैं। यदि “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की नीति चलेगी, तो अराजकता बढ़ेगी।

प्रश्न- चीन और रूस की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?
उत्तर-
चीन और रूस खुलकर टकराव से बच रहे हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष संघर्ष विश्वयुद्ध की आशंका को जन्म दे सकता है। लेकिन वे रणनीतिक संतुलन साधे हुए हैं। चीन द्वारा ईरान से तेल की बड़ी खरीद केवल व्यापार नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन का संकेत है। दोनों देश फिलहाल तनाव को सीमित रखने की नीति पर हैं।

प्रश्न- क्या यह संघर्ष तीसरे विश्वयुद्ध का रूप ले सकता है?
उत्तर-
यदि यूके, फ्रांस या जर्मनी सीधे शामिल होते हैं, तो दबाव बढ़ेगा। तब चीन और रूस की भूमिका भी निर्णायक हो जाएगी। अभी तक प्रयास यही है कि संघर्ष क्षेत्रीय दायरे में रहे। यदि संयम टूटा, तो वैश्विक संकट गहरा सकता है।

प्रश्न- भारत और ईरान के संबंधों को आप किस तरह देखते हैं?
उत्तर-
ईरान और भारत के संबंध सांस्कृतिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर गहरे हैं। फारसी भाषा, ‘जफरनामा’ और ऐतिहासिक विरासत हमें जोड़ती है। रणनीतिक दृष्टि से चहाबार का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच देता है। इसलिए संतुलित और सम्मानजनक संबंध भारत के हित में हैं।

प्रश्न- खाड़ी क्षेत्र में तनाव का वैश्विक असर कितना गंभीर हो सकता है?
उत्तर-
खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। यदि संघर्ष वहां फैलता है, तो वैश्विक तेल व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा। पाकिस्तान में शिया-सुन्नी समीकरण और ईरान के साथ उसके संबंध भी स्थिति को जटिल बनाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि संघर्ष सीमित रहे।

प्रश्न- भारत को इस परिस्थिति में क्या नीति अपनानी चाहिए?
उत्तर-
भारत को “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना के साथ, परंतु अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित कूटनीति अपनानी चाहिए। संवेदनशील घटनाओं पर मानवीय प्रतिक्रिया और शोक-संवेदना भी रिश्तों को मजबूत बनाती है। कूटनीति केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि नैतिक परिपक्वता का परिचायक है।

प्रश्न- अंत में, आपके चार दशकों के अनुभव का सार क्या है?
उत्तर- शक्ति क्षणिक हो सकती है, लेकिन संतुलन और संवाद ही स्थायी शांति की आधारशिला हैं। यदि ईरान–इजराइल संघर्ष अनियंत्रित हुआ तो विश्वयुद्ध की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि संयम और संवाद कायम रहे, तो शांति की संभावना अभी भी जीवित है।

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