{"_id":"6a26f0feb96453c8e702b606","slug":"bank-profits-hit-record-levels-but-msmes-struggle-with-expensive-loans-ludhiana-news-c-74-1-lud1001-116194-2026-06-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Ludhiana News: बैंकों का मुनाफा रिकॉर्ड स्तर पर लेकिन महंगे ऋण से जूझ रहे एमएसएमई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Ludhiana News: बैंकों का मुनाफा रिकॉर्ड स्तर पर लेकिन महंगे ऋण से जूझ रहे एमएसएमई
संवाद न्यूज एजेंसी, लुधियाना
Updated Mon, 08 Jun 2026 10:12 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
वर्ल्ड एमएसएमई फोरम ने केंद्र सरकार को भेजा ज्ञापन, समाधान की मांग
संवाद न्यूज एजेंसी
लुधियाना। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, बढ़ती इनपुट लागत और महंगे ऋण के बोझ से जूझ रहे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को राहत देने के लिए वर्ल्ड एमएसएमई फोरम (डब्ल्यूएमएसएमई) ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। फोरम ने केंद्रीय वित्त मंत्री को भेजे ज्ञापन में रेपो रेट को चरणबद्ध तरीके से 5.25 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत करने सहित कई अहम सुझाव दिए हैं।
फोरम ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 5 जून, 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा है। हालांकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई अप्रैल 2026 में करीब 3.5 प्रतिशत रही, जबकि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई बढ़कर 8.3 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, आयातित वस्तुओं की लागत, लॉजिस्टिक्स खर्च और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान हैं।
फोरम के प्रधान बदीश जिंदल का तर्क है कि मौजूदा महंगाई मुख्य रूप से आयातित और आपूर्ति पक्ष से जुड़ी है, न कि मांग आधारित। ऐसे में ऊंची ब्याज दरें महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पाएंगी, बल्कि उद्योगों और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ाएंगी।
विज्ञापन
ज्ञापन में कहा गया है कि सरकार की इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) 5.0 के तहत ऋण पर अधिकतम 9 प्रतिशत ब्याज लिया जा रहा है, जबकि सामान्य एमएसएमई ऋण दरें 9 से 16 प्रतिशत तक हैं। गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों (एनबीएफसी) की दरें इससे भी अधिक हैं। कम लाभ मार्जिन पर काम करने वाले छोटे उद्योगों के लिए इतनी ऊंची ब्याज दरों पर कारोबार चलाना मुश्किल होता जा रहा है। इसके चलते अनेक इकाइयां विस्तार योजनाएं टाल रही हैं और कार्यशील पूंजी की कमी से जूझ रही हैं।
फोरम ने यह भी रेखांकित किया कि एक ओर एमएसएमई महंगे कर्ज से परेशान हैं, वहीं बैंकिंग क्षेत्र रिकॉर्ड मुनाफा कमा रहा है। भारतीय स्टेट बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 में 80,032 करोड़ रुपये, एचडीएफसी बैंक ने 74,670 करोड़ रुपये, आईसीआईसीआई बैंक ने 50,147 करोड़ रुपये और एक्सिस बैंक ने 24,457 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल लाभ लगभग 1.98 लाख करोड़ रुपये रहा।
ज्ञापन में कहा गया है कि सस्ती ब्याज दरों से आवास क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा। रेपो रेट को 3 प्रतिशत तक लाने से गृह ऋण की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है, जिससे आवासीय मांग और निर्माण गतिविधियों को गति मिलेगी तथा रोजगार सृजन बढ़ेगा।
सस्ता और सुलभ ऋण उपलब्ध हो :
फोरम ने एमएसएमई के लिए 2-3 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी, ईसीएलजीएस जैसी योजनाओं का विस्तार, सिडबी के माध्यम से रियायती पुनर्वित्त सुविधा, एमएसएमई स्थिरीकरण कोष, कर प्रोत्साहन और कार्यशील पूंजी सहायता की मांग की है। साथ ही बैंकों के क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात को मौजूदा 82.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 87-88 प्रतिशत करने का सुझाव भी दिया गया है। फोरम का कहना है कि भारत के एमएसएमई देश की जीडीपी में लगभग एक-तिहाई योगदान देते हैं, कुल निर्यात का करीब आधा हिस्सा संभालते हैं और करोड़ों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में समय रहते सस्ता और सुलभ ऋण उपलब्ध कराना आर्थिक विकास और रोजगार संरक्षण के लिए आवश्यक है।
संवाद न्यूज एजेंसी
लुधियाना। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, बढ़ती इनपुट लागत और महंगे ऋण के बोझ से जूझ रहे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को राहत देने के लिए वर्ल्ड एमएसएमई फोरम (डब्ल्यूएमएसएमई) ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। फोरम ने केंद्रीय वित्त मंत्री को भेजे ज्ञापन में रेपो रेट को चरणबद्ध तरीके से 5.25 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत करने सहित कई अहम सुझाव दिए हैं।
फोरम ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 5 जून, 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा है। हालांकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई अप्रैल 2026 में करीब 3.5 प्रतिशत रही, जबकि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई बढ़कर 8.3 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, आयातित वस्तुओं की लागत, लॉजिस्टिक्स खर्च और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
फोरम के प्रधान बदीश जिंदल का तर्क है कि मौजूदा महंगाई मुख्य रूप से आयातित और आपूर्ति पक्ष से जुड़ी है, न कि मांग आधारित। ऐसे में ऊंची ब्याज दरें महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पाएंगी, बल्कि उद्योगों और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ाएंगी।
Trending Videos
ज्ञापन में कहा गया है कि सरकार की इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) 5.0 के तहत ऋण पर अधिकतम 9 प्रतिशत ब्याज लिया जा रहा है, जबकि सामान्य एमएसएमई ऋण दरें 9 से 16 प्रतिशत तक हैं। गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों (एनबीएफसी) की दरें इससे भी अधिक हैं। कम लाभ मार्जिन पर काम करने वाले छोटे उद्योगों के लिए इतनी ऊंची ब्याज दरों पर कारोबार चलाना मुश्किल होता जा रहा है। इसके चलते अनेक इकाइयां विस्तार योजनाएं टाल रही हैं और कार्यशील पूंजी की कमी से जूझ रही हैं।
फोरम ने यह भी रेखांकित किया कि एक ओर एमएसएमई महंगे कर्ज से परेशान हैं, वहीं बैंकिंग क्षेत्र रिकॉर्ड मुनाफा कमा रहा है। भारतीय स्टेट बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 में 80,032 करोड़ रुपये, एचडीएफसी बैंक ने 74,670 करोड़ रुपये, आईसीआईसीआई बैंक ने 50,147 करोड़ रुपये और एक्सिस बैंक ने 24,457 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल लाभ लगभग 1.98 लाख करोड़ रुपये रहा।
ज्ञापन में कहा गया है कि सस्ती ब्याज दरों से आवास क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा। रेपो रेट को 3 प्रतिशत तक लाने से गृह ऋण की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है, जिससे आवासीय मांग और निर्माण गतिविधियों को गति मिलेगी तथा रोजगार सृजन बढ़ेगा।
सस्ता और सुलभ ऋण उपलब्ध हो :
फोरम ने एमएसएमई के लिए 2-3 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी, ईसीएलजीएस जैसी योजनाओं का विस्तार, सिडबी के माध्यम से रियायती पुनर्वित्त सुविधा, एमएसएमई स्थिरीकरण कोष, कर प्रोत्साहन और कार्यशील पूंजी सहायता की मांग की है। साथ ही बैंकों के क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात को मौजूदा 82.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 87-88 प्रतिशत करने का सुझाव भी दिया गया है। फोरम का कहना है कि भारत के एमएसएमई देश की जीडीपी में लगभग एक-तिहाई योगदान देते हैं, कुल निर्यात का करीब आधा हिस्सा संभालते हैं और करोड़ों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में समय रहते सस्ता और सुलभ ऋण उपलब्ध कराना आर्थिक विकास और रोजगार संरक्षण के लिए आवश्यक है।