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Mohali News: सबूतों के अभाव में आईजी गौतम चीमा सहित सभी छह आरोपी बरी

Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 22 Apr 2026 02:21 AM IST
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All six accused, including IG Gautam Cheema, were acquitted due to lack of evidence.
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मोहाली। चर्चित पुलिस स्टेशन प्रकरण में सीबीआई की विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाकर आईजी गौतम चीमा सहित अन्य छह आरोपियों वरुण उत्रेजा, अजय चौधरी, रश्मि नेगी, विक्की वर्मा और आर्यन सिंह को बरी कर दिया है। सीबीआई की अदालत ने निचली अदालत के दोष सिद्धि के आदेशों को रद्द कर कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट की 20 दिसंबर 2024 को सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया गया है। यह मामला 26 अगस्त 2014 की रात से जुड़ा है। आरोप था कि तत्कालीन आईजी गौतम चीमा सहित अन्य लोगों ने एक घोषित अपराधी सुमेध गुलाटी को फेज-1 थाने में पुलिस हिरासत से छुड़ाकर मैक्स अस्पताल ले जाकर उसके साथ मारपीट की।
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चार मुख्य बिंदुओं पर फेल हुआ अभियोजन

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन चार अहम बिंदुओं गिरफ्तारी, हिरासत से छुड़ाना, दोबारा गिरफ्तारी और आरोपियों की पहचान में से किसी को भी ठोस रूप से साबित नहीं कर सका। रिकॉर्ड में यह तक स्पष्ट नहीं हो पाया कि सुमेध गुलाटी को पहले पुलिस ने विधिवत गिरफ्तार किया था या नहीं। हिरासत से छुड़ाने की कहानी भी साक्ष्यों के अभाव में कमजोर मिली। वहीं मैक्स अस्पताल से दोबारा गिरफ्तारी के दावे को भी अदालत ने अविश्वसनीय माना। मामले में सबसे बड़ा झटका अभियोजन को गवाहों के मुकरने से लगा। कई अहम गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से पीछे हट गए। अदालत में कोई भी गवाह आरोपियों की पहचान नहीं कर सका। एएसआई दिलबाग सिंह और अन्य पुलिस गवाह भी आरोपियों को पहचानने में असफल रहे। संतरी गवाह ने भी घटना का दावा किया, लेकिन किसी आरोपी की पहचान नहीं कर पाया। अदालत ने गवाहों के बयानों को असंगत और अविश्वसनीय माना।
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डिजिटल सबूत भी नहीं आए काम

अभियोजन ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज जैसे डिजिटल सबूत पेश किए, लेकिन ये कानूनी रूप से प्रमाणित नहीं थे। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणन न होने के कारण अदालत ने इन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया।

ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी खारिज

अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि गवाह डर के कारण मुकर गए। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं। इन्हीं आधारों पर सभी आरोपियों को बरी करते हुए उनके जमानत बांड छह महीने तक प्रभावी रखने के निर्देश दिए गए हैं।
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