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Mohali News: सीबीआई मामले में हस्ताक्षर देने के आदेश को चुनौती, अदालत ने याचिका की खारिज
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मोहाली। सीबीआई के एक चर्चित धोखाधड़ी मामले में आरोपी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को विशेष अदालत ने खारिज कर दिया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें आरोपियों को अपने नमूना हस्ताक्षर देने के निर्देश दिए गए थे।
यह मामला वर्ष 2022 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि आरोपियों ने फर्जी पहचान के आधार पर बैंक से करोड़ों रुपये का ऋण हासिल किया। शिकायत पंजाब नेशनल बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक द्वारा दी गई थी। आरोप के अनुसार, एक व्यक्ति ने खुद को सुरिंदर कुमार बताकर बैंक से 3.50 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट हासिल की। बाद में यह खाता एनपीए घोषित हो गया। जांच के दौरान सीबीआई ने आरोपियों के हस्ताक्षर के नमूने लेकर उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा था। फॉरेंसिक साइंस लैब (सीएफएसएल) की रिपोर्ट में कुछ और नमूनों की आवश्यकता जताई गई थी। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोबारा नमूना हस्ताक्षर देने के निर्देश दिए थे।
आरोपियों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर की। उनके वकील ने तर्क दिया कि बिना गिरफ्तारी के किसी आरोपी को हस्ताक्षर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि ट्रायल के दौरान ऐसे आदेश देना अभियोजन पक्ष की कमियों को पूरा करने जैसा है। अदालत ने इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को जबरन हस्ताक्षर देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यदि आरोपी मना करता है तो अदालत उसके खिलाफ साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(ग) के तहत प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है। अंतत: अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और मामले की प्रति संबंधित अदालत को भेजने के निर्देश दिए।
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यह मामला वर्ष 2022 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि आरोपियों ने फर्जी पहचान के आधार पर बैंक से करोड़ों रुपये का ऋण हासिल किया। शिकायत पंजाब नेशनल बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक द्वारा दी गई थी। आरोप के अनुसार, एक व्यक्ति ने खुद को सुरिंदर कुमार बताकर बैंक से 3.50 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट हासिल की। बाद में यह खाता एनपीए घोषित हो गया। जांच के दौरान सीबीआई ने आरोपियों के हस्ताक्षर के नमूने लेकर उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा था। फॉरेंसिक साइंस लैब (सीएफएसएल) की रिपोर्ट में कुछ और नमूनों की आवश्यकता जताई गई थी। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोबारा नमूना हस्ताक्षर देने के निर्देश दिए थे।
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आरोपियों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर की। उनके वकील ने तर्क दिया कि बिना गिरफ्तारी के किसी आरोपी को हस्ताक्षर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि ट्रायल के दौरान ऐसे आदेश देना अभियोजन पक्ष की कमियों को पूरा करने जैसा है। अदालत ने इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को जबरन हस्ताक्षर देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यदि आरोपी मना करता है तो अदालत उसके खिलाफ साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(ग) के तहत प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है। अंतत: अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और मामले की प्रति संबंधित अदालत को भेजने के निर्देश दिए।

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