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Punjab: कच्चे माल के संकट से हांफ रही कॉटन इंडस्ट्री, दूसरे राज्यों पर निर्भर हुआ सूबे का टेक्सटाइल सेक्टर

राजीव शर्मा, संवाद, लुधियाना (पंजाब) Published by: Nivedita Updated Thu, 30 Apr 2026 11:09 AM IST
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सार

एक समय पंजाब में सात लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती होती थी, जिससे राज्य में जिनिंग और स्पिनिंग उद्योग तेजी से विकसित हुआ। लेकिन बीते वर्षों में कपास का रकबा लगातार घटता गया।

Punjab Cotton Industry Reels Under Raw Material Crisis Textile Sector Becomes Dependent on Other States
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार

कच्चे माल की कमी ने पंजाब की कॉटन इंडस्ट्री की रफ्तार थाम दी है। हालत यह है कि स्थानीय स्तर पर जरूरत के अनुसार कपास उपलब्ध नहीं हो रही, जिसके चलते उद्योगों को महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों से कच्चा माल मंगवाकर उत्पादन चलाना पड़ रहा है। 
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इस संकट ने खासकर जिनिंग सेक्टर को बुरी तरह प्रभावित किया है, जहां कभी 422 इकाइयां संचालित होती थीं, अब उनकी संख्या घटकर मात्र 25 रह गई है। उद्यमियों का कहना है कि यदि हालात में जल्द सुधार नहीं हुआ तो उद्योग के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है।
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7 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.2 लाख पर सिमटा रकबा

एक समय पंजाब में सात लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती होती थी, जिससे राज्य में जिनिंग और स्पिनिंग उद्योग तेजी से विकसित हुआ। लेकिन बीते वर्षों में कपास का रकबा लगातार घटता गया, 2019 में यह 3.35 लाख हेक्टेयर था और अब यह करीब 1.2 लाख हेक्टेयर तक सिमट चुका है। रकबा घटने के पीछे कीटनाशक हमले, कम पैदावार और किसानों का अन्य फसलों की ओर झुकाव प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

उन्नत बीज की कमी से पिछड़ रहा पंजाब

पंजाब कॉटन फैक्ट्रीज एंड जिनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भगवान बांसल के अनुसार, महाराष्ट्र में किसानों को जी-4 जैसी उन्नत किस्म का बीज उपलब्ध कराया जा रहा है, जो गुलाबी सुंडी और सफेद मक्खी जैसी बीमारियों के प्रति अधिक प्रतिरोधी है। इससे वहां प्रति एकड़ 12-15 क्विंटल तक उत्पादन मिल रहा है। इसके विपरीत, पंजाब अभी भी पुरानी किस्मों पर निर्भर है, जिससे पैदावार कम है और किसान कपास की खेती से दूरी बना रहे हैं।

उत्पादन में भारी अंतर, बाहर से मंगानी पड़ रही कपास

आंकड़ों के मुताबिक, इस सीजन में महाराष्ट्र में लगभग 1.15 करोड़ गांठ कपास का उत्पादन हुआ, जबकि पंजाब में यह आंकड़ा केवल 1.5 लाख गांठ तक सीमित है। यही कारण है कि राज्य की स्पिनिंग मिलों और जिनिंग इकाइयों को अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
--देशभर में 26 अप्रैल 2026 तक कपास की आवक 308.70 लाख गांठ को पार कर चुकी है और 30 अप्रैल 2026 तक 311 लाख गांठ तक पहुंचने का अनुमान है। पूरे सीजन में कुल उत्पादन 335 लाख गांठ से अधिक रहने की संभावना है, लेकिन इसमें पंजाब की हिस्सेदारी बेहद कम है।

कई इकाइयां बंद, कारोबार का पलायन

कपास की कमी के चलते राज्य में बड़ी संख्या में जिनिंग मिलें बंद हो चुकी हैं। कई उद्योगपति अपना कारोबार राजस्थान और अन्य राज्यों में स्थानांतरित कर चुके हैं। इससे न केवल उद्योग प्रभावित हुआ है, बल्कि रोजगार पर भी असर पड़ा है।

सरकार का फोकस: सब्सिडी और रकबा बढ़ाने का लक्ष्य

स्थिति को सुधारने के लिए राज्य सरकार ने कपास की खेती को बढ़ावा देने हेतु प्रमाणित बीजों पर 33 प्रतिशत सब्सिडी देने का फैसला किया है। कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के अनुसार, सरकार ने 2026 के लिए कपास का रकबा 1.25 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इस योजना के तहत पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित 87 बीटी हाइब्रिड और चार देसी किस्मों को शामिल किया गया है। सब्सिडी सीधे किसानों के बैंक खातों में ट्रांसफर की जाएगी।

धान से कपास की ओर शिफ्ट की अपील

सरकार ने किसानों से अधिक पानी खपत करने वाली धान की खेती छोड़कर कपास की ओर रुख करने की अपील की है। इसे ‘सफेद सोना’ बताते हुए वैज्ञानिक खेती और उन्नत बीजों के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है।

हालांकि सरकार के प्रयास जारी हैं, लेकिन मौजूदा हालात में उद्योग को तत्काल राहत मिलती नजर नहीं आ रही। जब तक उत्पादन और रकबा दोनों में ठोस वृद्धि नहीं होती, तब तक पंजाब की कॉटन इंडस्ट्री पर संकट के बादल छाए रहेंगे।
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