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सुर्खियों में अढ़ाई दिन का झोपड़ा; महाराणा प्रताप सेना ने हनुमान चालीसा पाठ की अनुमति मांगी, नई बहस का जन्म
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर
Published by: अजमेर ब्यूरो
Updated Tue, 19 May 2026 07:55 PM IST
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सार
महाराणा प्रताप सेना ने जिला प्रशासन को पत्र लिखकर अजमेर के ऐतिहासिक अढ़ाई दिन के झोपड़े में शांतिपूर्ण हनुमान चालीसा पाठ की अनुमति मांगी है, जिसके बाद इस ऐतिहासिक स्मारक और उसके इतिहास को लेकर फिर से चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
अढ़ाई दिन को झोपड़ा फिर क्यों आया चर्चा में?
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अजमेर में ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में हिंदू शिव मंदिर होने का मुद्दा अभी ठंडा नहीं हुआ कि एक और मुद्दे ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस बार मामला अढ़ाई दिन के झोपड़े को लेकर उठा है। जहां हनुमान चालीसा पढ़ने की बात की जा रही है। जानें क्या है पूरा मामला…
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महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजवर्धन सिंह परमार ने 16 मई को अजमेर जिला कलेक्टर को एक विस्तृत पत्र भेजकर अढ़ाई दिन के झोपड़ा परिसर में हनुमान चालीसा पाठ कराने की अनुमति मांगी है। संगठन ने कहा कि आगामी मंगलवार को बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और पदाधिकारी वहां शांतिपूर्ण धार्मिक आयोजन करना चाहते हैं।
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पत्र में संगठन ने मध्यप्रदेश के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामले का हवाला देते हुए कहा कि देशभर में ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों की वास्तविक पहचान सामने आ रही है। महाराणा प्रताप सेना का दावा है कि अढ़ाई दिन का झोपड़ा मूल रूप से एक प्राचीन संस्कृत कंठाभरण विद्यालय और हिंदू-जैन मंदिर था, जिसे बाद में बदला गया।
संगठन ने अपने पत्र में यह भी कहा कि परिसर की दीवारों, स्तंभों और वास्तुकला में मौजूद ऐतिहासिक प्रमाण इस दावे को मजबूत करते हैं। इसी आधार पर उन्होंने वहां धार्मिक आस्था व्यक्त करने के लिए हनुमान चालीसा पाठ की अनुमति मांगी है। साथ ही प्रशासन से सुरक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की मांग भी की गई है। संगठन ने भरोसा दिलाया कि कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण रहेगा और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।
क्या है अढ़ाई दिन का झोपड़ा?
अढ़ाई दिन का झोपड़ा अजमेर दरगाह क्षेत्र के पास स्थित एक ऐतिहासिक स्मारक है। इतिहासकारों के अनुसार इसका निर्माण चौहान वंश के शासक वीसल देव (विग्रहराज चौहान 4) के समय संस्कृत शिक्षण केंद्र के रूप में हुआ था। बाद में 12वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक के शासनकाल के दौरान इसे मस्जिदनुमा संरचना में परिवर्तित किया गया।
यह स्मारक अपनी अनूठी इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के लिए जाना जाता है। परिसर में आज भी कई स्तंभ, नक्काशी और मूर्तिकला के अवशेष दिखाई देते हैं, जिन्हें लेकर समय-समय पर हिंदू और जैन संगठनों द्वारा दावे किए जाते रहे हैं कि यह मूल रूप से मंदिर और संस्कृत विद्यालय था।
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पहले भी उठ चुके हैं ऐसे दावे
यह पहला मौका नहीं है जब अढ़ाई दिन के झोपड़े को लेकर धार्मिक दावा सामने आया हो। भाजपा प्रवक्ता और अजमेर नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज जैन भी पहले इसे जैन मंदिर और संस्कृत विद्यालय बता चुके हैं। उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार से स्मारक का सर्वे करवाकर इसे मूल स्वरूप में लौटाने की मांग की थी।
नीरज जैन ने यह आरोप भी लगाया था कि परिसर में कुछ अनैतिक और धार्मिक गतिविधियां हो रही हैं, जिन पर रोक लगाई जानी चाहिए। उन्होंने सरकार से स्मारक के संरक्षण और उसके ऐतिहासिक स्वरूप को सुरक्षित रखने की मांग की थी।
जैन संतों का दौरा भी बना था चर्चा का विषय
मई 2024 में जैन संत सुनील सागर महाराज, आरएसएस पदाधिकारियों और हिंदूवादी संगठनों के प्रतिनिधियों ने अढ़ाई दिन के झोपड़े का दौरा किया था। उस दौरान संतों ने दावा किया था कि यहां की वास्तुकला, खंडित मूर्तियां और स्तंभ स्पष्ट संकेत देते हैं कि यह स्थल कभी जैन मंदिर और संस्कृत पाठशाला रहा होगा।
सुनील सागर महाराज ने कहा था कि इतिहास समय के साथ बदलता रहा है लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने इस मुद्दे पर शांतिपूर्ण और संवेदनशील तरीके से निर्णय लेने की बात कही थी।
प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अढ़ाई दिन का झोपड़ा अजमेर का संवेदनशील और ऐतिहासिक स्थल माना जाता है। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की है।
महाराणा प्रताप सेना का पत्र सामने आने के बाद शहर में राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। अलग-अलग संगठनों और लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। फिलहाल प्रशासन ने अनुमति को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है लेकिन पूरे मामले पर नजर रखी जा रही है।
क्यों बढ़ रही है ऐसे मुद्दों की चर्चा?
हाल के वर्षों में देशभर में कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद और दावे सामने आए हैं। भोजशाला, ज्ञानवापी और शाही ईदगाह जैसे मामलों के बाद अब अजमेर का अढ़ाई दिन का झोपड़ा भी धार्मिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मांग पर क्या फैसला लेता है और आने वाले दिनों में यह मामला सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कितना बड़ा रूप लेता है।