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Rajasthan: सूखती जा रही 'धोरों की धरती', गेहूं बचाया तो गला सूखेगा...और प्यास बुझाई तो फसल बर्बाद
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, बीकानेर
Published by: अरविंद कुमार
Updated Sat, 08 Feb 2025 06:00 AM IST
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सार
पश्चिमी राजस्थान सूखे की कगार पर है। आठ जिलों में पानी के संकट की वजह से गेहूं की फसल सूख रही है। आने वाले दिनों में गर्मी बढ़ने पर परिस्थितियां और विकट हो सकती हैं। ऐसे में अब किसान आंदोलन की तैयारी करने लगे हैं।
राजस्थान में सूखा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पश्चिमी राजस्थान में आठ से ज्यादा जिलों पर पानी का संकट गहराता जा रहा है। इसकी वजह से किसान आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। यहां अगर गेहूं की फसल को बचाया जाता है तो गला सूखेगा। अगर प्यास बुझाई जाती है तो फसल बर्बाद होगी।
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ये सब इस वजह से है, क्योंकि पहाड़ों पर मानसून में पानी कम गिरा है। हिमालय की नदियों के कैचमेंट एरिया में पानी की कमी है। इसका असर करीब 600-700 किलोमीटर दूर थार रेगिस्तान तक नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में गर्मी बढ़ने पर परिस्थितियां और खराब हो सकती हैं।
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कहां कितनी पानी की सप्लाई
भाखड़ा व्यास मैनेजमेंट बोर्ड ने फरवरी महीने के लिए राजस्थान को केवल पेयजल के लिए इंदिरा गांधी नहर से तीन हजार क्यूसेक पेयजल देने की मंजूरी दी है। लेकिन सिंचाई के लिए नहरी पानी नहीं मिलने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। इस साल मानसून कमजोर रहने और भाखड़ा व पौंग बांध का जलस्तर घटने के कारण राजस्थान के पानी के हिस्से में कटौती करनी पड़ी है। हालात इतने गंभीर हैं कि इंदिरा गांधी नहर में सिंचाई के लिए पानी बंद कर दिया गया है।
बीबीएमबी की बैठक में राजस्थान की विभिन्न नहरों में जल आपूर्ति को लेकर यह निर्णय लिया गया है। इंदिरा गांधी नहर में तीन हजार क्यूसेक केवल पेयजल के लिए, गंग कैनाल में 1400 क्यूसेक, भाखड़ा 850 क्यूसेक, सिद्धमुख नोहर 500 क्यूसेक और खारा प्रणाली की नहरें 200 क्यूसेक ही पानी रहेगा। मसला इंदिरा गांधी कैनाल से ज्यादा उलझा है, क्योंकि इससे हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर जिले सहित 15 जिलों की कृषि और पेयजल आपूर्ति की जाती है। बीबीएमबी के अधिकारियों ने ये भी कहा कि पहाड़ों पर मानसून के दौरान कम पानी गिरा है। इसके कारण हिमालय से आने वाली नदियों में पानी कम है।
नहरबंदी बना कारण
करीब 200 किलोमीटर से ज्यादा लंबी इंदिरा गांधी कैनाल की हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर सहित 15 जिलों की कृषि और पेयजल आपूर्ति का मुख्य स्रोत है। इस पर नहरबंदी की गई है। नहरबंदी के समय कम पानी नहर में छोड़कर उसको सुधारा जाता है। जो पहले अप्रैल में होती थी, उसे फरवरी में कर दिया गया है। इसके साथ ही फरवरी में तीन हजार क्यूसेक पानी केवल पेयजल के लिए दिया जा रहा है। खेती के लिए पानी नहीं मिलने के कारण गेहूं की फसल सूख रही है।
बीकानेर के किसान इंद्राज पूनिया कहते हैं कि गेहूं को चार पानी लगते हैं, लेकिन अभी तक केवल दो बार पानी मिला है। खेत सूखने लगे हैं। फरवरी में गेहूं की पकाई के लिए नहरी पानी बेहद जरूरी होता है, लेकिन अब किसान सिंचाई के वैकल्पिक साधनों को लेकर भी असमंजस में हैं।
आंदोलन की सुगबुगाहट
इस मामले को लेकर किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही सिंचाई जल की व्यवस्था नहीं की गई तो गेहूं समेत अन्य फसलें प्रभावित होंगी। सरकार से किसानों ने जल प्रबंधन के वैकल्पिक उपाय निकालने और पानी की आपूर्ति बहाल करने की मांग की है।
आईजीएनपी नहर के किसानों के बीच भी सिंचाई पानी की मांग को लेकर आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। बीकानेर के सिंचित क्षेत्र में सिंचाई पानी की मांग को लेकर किसानों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। गेहूं और जौ की फसल को बचाने के लिए किसान पानी की दो बारी मांग रहे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से फरवरी से केवल पीने के पानी की आपूर्ति की जा रही है।
संयुक्त किसान मोर्चा और भारतीय किसान संघ के नेतृत्व में किसानों ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आगामी 10 फरवरी को घड़साना उपखंड कार्यालय का घेराव किया जाएगा। इसमें बीकानेर जिले के खाजूवाला, बज्जू, पूगल लूणकरणसर छतरगढ़ के किसान शामिल होंगे। किसान नेताओं का कहना है कि अगर हमें समय पर सिंचाई का पानी नहीं मिला, तो हमारी फसलें बर्बाद हो जाएंगी।
20 साल पहले क्या हुआ था
खाजूवाला क्षेत्र में भी सिंचाई पानी की मांग को लेकर आंदोलन की सुगबुगाहट एक बार फिर से तेज हो गई है। 20 साल पहले 27 अक्तूबर 2004 को खाजूवाला, रावला और घड़साना क्षेत्र में सिंचाई पानी की मांग को लेकर एक बहुत बड़ा आंदोलन हुआ था। जो किसान आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस किसान आंदोलन ने सरकार तक को हिला दिया था। करीब दो महीने तक चले इस आंदोलन में खाजूवाला, रावला और घड़साना में 10 दिन तक कर्फ्यू भी लगा था। आज 16 साल बाद इस क्षेत्र में एक बार फिर किसानों को सिंचाई पानी की कमी हो रही है। इस क्षेत्र के किसानों को प्रत्येक साल की नवंबर और दिसंबर में पानी की मांग को लेकर किसान आंदोलन भी झेलना पड़ता है, जिसमें कई बार राजनीतिक पार्टियों के नेता किसानों को गुमराह कर लेते हैं।
लेकिन आज से 20 साल पहले 2004 में बिना कोई राजनीतिक पार्टी के सिर्फ किसानों के नेतृत्व में यह आंदोलन हुआ था। हालांकि, उस समय कामरेडो का इस क्षेत्र में बोलबाला था। उस समय सिर्फ किसान, मजदूर और व्यापारी अपने पेट की रोजी रोटी के लिए सड़कों पर उतरा था। किसान मजदूर व्यापारी संघर्ष समिति के नेतृत्व में यह आंदोलन हुआ था और देखते ही देखते आंदोलन ने एक बड़ा रूप ले लिया। इसमें सात किसान सिंचाई पानी की मांग करते हुए शहीद भी हुए थे।