राजस्थान निकाय चुनाव: हरियाणा-MP में प्रत्यक्ष चुनाव, राजस्थान में BJP का रुख अलग क्यों? विपक्ष ने उठाए सवाल
Rajasthan News: राजस्थान में निकाय चुनावों की घोषणा के साथ ही मेयर और चेयरमैन के चुनाव की पद्धति को लेकर सियासत गरमा गई है। भाजपा शासित राज्यों में ही अलग-अलग नियम देखने को मिल रहे हैं। इसे लेकर विपक्ष के साथ-साथ भाजपा के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आ रही है।
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'वन नेशन, वन इलेक्शन' और 'वन नेशन, वन टैक्स' का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी राजस्थान में निकाय प्रमुखों के चुनाव को लेकर अलग नीति अपनाने की तैयारी में नजर आ रही है। भाजपा शासित हरियाणा और मध्य प्रदेश में नगर निगमों के मेयर तथा नगर निकायों के चेयरमैन का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होता है, जबकि राजस्थान में एक बार फिर अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराने की तैयारी है। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है लेकिन पंचायत और निकाय चुनावों का कार्यक्रम जारी होने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा सूत्रों के अनुसार इस बार भी राजस्थान में निकाय प्रमुखों का चुनाव पार्षदों के माध्यम से ही कराया जाएगा।
हरियाणा-एमपी में डायरेक्ट, राजस्थान में इनडायरेक्ट
भाजपा शासित हरियाणा और मध्य प्रदेश में मेयर एवं चेयरमैन के चुनाव सीधे जनता करती है लेकिन राजस्थान में पार्टी इस मॉडल को लागू करने के पक्ष में नजर नहीं आ रही, जबकि भाजपा को शहरी क्षेत्रों की मजबूत पार्टी माना जाता है। हाल के लोकसभा चुनावों में भी पार्टी ने शहरी बहुल सीटों पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। इसके बावजूद निकाय प्रमुखों के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराने की तैयारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की बात करने वाली भाजपा राजस्थान में प्रत्यक्ष चुनाव कराने से क्यों बच रही है? राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि प्रत्यक्ष चुनाव में आमतौर पर सत्ताधारी दल को लाभ मिलता है।
राजस्थान में पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में एक बार मेयर का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराया गया था, जिसमें कांग्रेस की ज्योति खंडेलवाल जयपुर की पहली महिला मेयर चुनी गई थीं।
भाजपा के भीतर भी अलग-अलग राय
दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि भाजपा का एक वर्ग भी निकाय प्रमुखों के प्रत्यक्ष चुनाव का समर्थक है हालांकि सूत्रों का कहना है कि कई विधायकों के दबाव के चलते पार्टी अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली को ही जारी रखना चाहती है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक प्रत्यक्ष चुनाव से चुने गए मेयर या चेयरमैन अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार बना लेते हैं। ऐसे जनप्रतिनिधि भविष्य में विधानसभा और लोकसभा टिकट के दावेदार भी बन सकते हैं, जिससे स्थानीय विधायकों के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती मिलती है।
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा का पक्ष
पंचायत और निकाय चुनावों में देरी के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले पूर्व विधायक संयम लोढ़ा का कहना है कि भाजपा हर मामले में दोहरा रवैया अपनाती है। मध्य प्रदेश और हरियाणा में स्थानीय निकाय प्रमुखों के चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाते हैं लेकिन राजस्थान में पार्षदों के जरिए चुनाव कराए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि भाजपा सत्ता का दुरुपयोग कर स्थानीय निकायों पर कब्जा करना चाहती है।
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भाजपा का पक्ष
भाजपा के पूर्व विधायक एवं वरिष्ठ प्रवक्ता रामलाल शर्मा का कहना है कि राजस्थान में निकाय प्रमुखों के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराने में डर जैसी कोई बात नहीं है। उनका कहना है कि भाजपा कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है। उन्होंने कहा कि पूर्व में प्रत्यक्ष चुनाव के अनुभव अच्छे नहीं रहे। कई बार बोर्ड में एक पार्टी का बहुमत होता है और मेयर या चेयरमैन दूसरी पार्टी का चुन लिया जाता है, जिससे टकराव की स्थिति बनती है और विकास कार्य प्रभावित होते हैं। इसी कारण राजस्थान में अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली को उचित माना गया है।
पूर्व मेयर अशोक लाहोटी की राय
जयपुर के पूर्व मेयर और सांगानेर से पूर्व विधायक अशोक लाहोटी का कहना है कि निकाय प्रमुखों का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होना चाहिए। उनके अनुसार इससे राजनीतिक दबाव कम रहता है, प्रशासन को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलता है और भ्रष्टाचार की संभावना भी घटती है। उन्होंने कहा कि अप्रत्यक्ष चुनाव में बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त की आशंका रहती है।
आरएलडी का पक्ष
आरएलडी के राष्ट्रीय महासचिव एवं भरतपुर विधायक का कहना है कि प्रत्यक्ष चुनाव से जनता की भागीदारी बढ़ती है और चुना गया निकाय प्रमुख सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होता है। उन्होंने कहा कि अप्रत्यक्ष चुनाव में पार्षदों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जिससे विकास की बजाय भ्रष्टाचार की आशंका बढ़ जाती है।
कांग्रेस का पक्ष
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं प्रवक्ता स्वर्णिम चतुर्वेदी का कहना है कि निकाय प्रमुखों का चुनाव प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, यह सरकार का नीतिगत निर्णय है लेकिन सबसे पहले सरकार को समय पर चुनाव कराने चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की मुख्य आपत्ति चुनाव प्रणाली नहीं, बल्कि पंचायत और निकाय चुनावों में लगातार हो रही देरी को लेकर है।