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गोल्डन ऑवर बचाने की तैयारी: राजस्थान में डिजिटल इमरजेंसी रेफरल सिस्टम, मरीज पहुंचने से पहले अस्पताल अलर्ट
Fri, 31 Jul 2026 03:05 PM IST
Sourabh Bhatt
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Sourabh Bhatt
Updated Fri, 31 Jul 2026 03:05 PM IST
सार
राजस्थान सरकार पूरे प्रदेश में डिजिटल इमरजेंसी रेफरल सिस्टम लागू करेगी। मरीज के अस्पताल पहुंचने से पहले डॉक्टरों को पूरी जानकारी मिलेगी, जिससे गोल्डन ऑवर में इलाज शुरू कर जान बचाने की संभावना बढ़ेगी।
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setu
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राजस्थान गंभीर मरीजों के इलाज में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। अब किसी मरीज के मेडिकल कॉलेज या बड़े अस्पताल पहुंचने से पहले ही वहां के डॉक्टर उसकी बीमारी, स्थिति और एंबुलेंस के पहुंचने का समय जान सकेंगे। इसके लिए राज्य सरकार पूरे प्रदेश में डिजिटल इमरजेंसी रेफरल सिस्टम 'सेतु (SETU) लागू करने जा रही है। अधिकारियों का दावा है कि इसके लागू होने के बाद राजस्थान ऐसा व्यापक राज्यव्यापी डिजिटल इमरजेंसी रेफरल नेटवर्क विकसित करने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है।
मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने हाल ही में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (DoIT) और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) को प्लेटफॉर्म का सुरक्षा ऑडिट और प्रमाणन कराने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद इसे सभी सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
मरीज के पहुंचने से पहले डॉक्टर होंगे तैयार
नई व्यवस्था के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) या जिला अस्पताल से रेफर किए जाने वाले मरीज की जानकारी डॉक्टर स्मार्टफोन से क्यूआर कोड स्कैन कर अपलोड करेंगे। इसमें मरीज की बीमारी, वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति, रेफरल का कारण और अस्पताल पहुंचने का अनुमानित समय (ETA) दर्ज होगा।
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यह जानकारी तत्काल 24×7 संचालित डिजिटल कंट्रोल रूम तक पहुंचेगी। वहां से संबंधित विशेषज्ञ विभागों-जैसे ट्रॉमा, सर्जरी, मेडिसिन, स्त्री एवं प्रसूति रोग, बाल रोग आदि को अलर्ट भेज दिया जाएगा। यदि संभव होगा तो एंबुलेंस की लाइव जीपीएस ट्रैकिंग भी होगी और मरीज के लिए आईसीयू या इमरजेंसी बेड पहले से आरक्षित कर दिए जाएंगे।
'ब्लाइंड अराइवल' की समस्या होगी खत्म'
अभी तक बड़े अस्पतालों में कई मरीज बिना पूर्व सूचना के पहुंचते हैं। डॉक्टरों को मरीज के आने के बाद उसकी फाइल देखनी पड़ती है, विशेषज्ञों को बुलाना पड़ता है और बेड की व्यवस्था करनी पड़ती है, जिससे इलाज शुरू होने में कीमती समय नष्ट हो जाता है। SETU प्रणाली इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर मरीज के अस्पताल पहुंचने से पहले ही चिकित्सा टीम को तैयार कर देगी।
उदयपुर मॉडल की सफलता के बाद पूरे प्रदेश में विस्तार
यह प्रणाली सबसे पहले उदयपुर के रवींद्रनाथ टैगोर (RNT) मेडिकल कॉलेज में विकसित की गई थी। पायलट प्रोजेक्ट के तहत अब तक 3,519 से अधिक गंभीर और आपातकालीन मरीजों का सफल प्रबंधन किया जा चुका है।
इनमें सबसे अधिक 2,264 मरीज उदयपुर, 1,147 राजसमंद और 58 सलूंबर से रेफर किए गए। इसके अलावा चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़, पाली, सिरोही, अजमेर, जोधपुर, बांसवाड़ा और मध्य प्रदेश के नीमच तक से मरीज इस नेटवर्क के जरिए जुड़े।
किस तरह के मरीजों को मिला लाभ
SETU के जरिए अब तक 1,785 मेडिकल इमरजेंसी, 708 ट्रॉमा एवं सर्जिकल, 558 गंभीर बाल रोग और 460 प्रसूति एवं स्त्री रोग से जुड़े मरीजों का समन्वित इलाज किया गया। इसके अलावा सात बड़े सामूहिक दुर्घटना (मास कैजुअल्टी) मामलों में भी इस प्रणाली ने अस्पतालों के बीच समन्वय स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
इलाज के बाद भी होगी निगरानी
SETU केवल रेफरल तक सीमित नहीं रहेगा। मरीज के भर्ती होने के अगले दिन कंट्रोल रूम से फोन कर उपचार और अस्पताल सेवाओं को लेकर फीडबैक भी लिया जाएगा। इससे व्यवस्था में सुधार और मरीजों को बेहतर सेवाएं देने में मदद मिलेगी।
कम लागत, बड़ा बदलाव
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस प्रणाली के लिए किसी महंगे उपकरण की जरूरत नहीं है। यह केवल स्मार्टफोन, क्यूआर कोड और सरकारी क्लोज्ड यूजर ग्रुप (CUG) नेटवर्क के जरिए संचालित होगी। इससे इसे कम लागत में पूरे प्रदेश में लागू किया जा सकेगा।
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि राजस्थान जैसे भौगोलिक रूप से बड़े राज्य में, जहां दूर-दराज के इलाकों से मरीजों को मेडिकल कॉलेज पहुंचने में कई घंटे लग जाते हैं, यह प्रणाली 'गोल्डन ऑवर' के दौरान समय बचाकर गंभीर मरीजों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने हाल ही में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (DoIT) और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) को प्लेटफॉर्म का सुरक्षा ऑडिट और प्रमाणन कराने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद इसे सभी सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
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मरीज के पहुंचने से पहले डॉक्टर होंगे तैयार
नई व्यवस्था के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) या जिला अस्पताल से रेफर किए जाने वाले मरीज की जानकारी डॉक्टर स्मार्टफोन से क्यूआर कोड स्कैन कर अपलोड करेंगे। इसमें मरीज की बीमारी, वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति, रेफरल का कारण और अस्पताल पहुंचने का अनुमानित समय (ETA) दर्ज होगा।
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यह जानकारी तत्काल 24×7 संचालित डिजिटल कंट्रोल रूम तक पहुंचेगी। वहां से संबंधित विशेषज्ञ विभागों-जैसे ट्रॉमा, सर्जरी, मेडिसिन, स्त्री एवं प्रसूति रोग, बाल रोग आदि को अलर्ट भेज दिया जाएगा। यदि संभव होगा तो एंबुलेंस की लाइव जीपीएस ट्रैकिंग भी होगी और मरीज के लिए आईसीयू या इमरजेंसी बेड पहले से आरक्षित कर दिए जाएंगे।
'ब्लाइंड अराइवल' की समस्या होगी खत्म'
अभी तक बड़े अस्पतालों में कई मरीज बिना पूर्व सूचना के पहुंचते हैं। डॉक्टरों को मरीज के आने के बाद उसकी फाइल देखनी पड़ती है, विशेषज्ञों को बुलाना पड़ता है और बेड की व्यवस्था करनी पड़ती है, जिससे इलाज शुरू होने में कीमती समय नष्ट हो जाता है। SETU प्रणाली इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर मरीज के अस्पताल पहुंचने से पहले ही चिकित्सा टीम को तैयार कर देगी।
उदयपुर मॉडल की सफलता के बाद पूरे प्रदेश में विस्तार
यह प्रणाली सबसे पहले उदयपुर के रवींद्रनाथ टैगोर (RNT) मेडिकल कॉलेज में विकसित की गई थी। पायलट प्रोजेक्ट के तहत अब तक 3,519 से अधिक गंभीर और आपातकालीन मरीजों का सफल प्रबंधन किया जा चुका है।
इनमें सबसे अधिक 2,264 मरीज उदयपुर, 1,147 राजसमंद और 58 सलूंबर से रेफर किए गए। इसके अलावा चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़, पाली, सिरोही, अजमेर, जोधपुर, बांसवाड़ा और मध्य प्रदेश के नीमच तक से मरीज इस नेटवर्क के जरिए जुड़े।
किस तरह के मरीजों को मिला लाभ
SETU के जरिए अब तक 1,785 मेडिकल इमरजेंसी, 708 ट्रॉमा एवं सर्जिकल, 558 गंभीर बाल रोग और 460 प्रसूति एवं स्त्री रोग से जुड़े मरीजों का समन्वित इलाज किया गया। इसके अलावा सात बड़े सामूहिक दुर्घटना (मास कैजुअल्टी) मामलों में भी इस प्रणाली ने अस्पतालों के बीच समन्वय स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
इलाज के बाद भी होगी निगरानी
SETU केवल रेफरल तक सीमित नहीं रहेगा। मरीज के भर्ती होने के अगले दिन कंट्रोल रूम से फोन कर उपचार और अस्पताल सेवाओं को लेकर फीडबैक भी लिया जाएगा। इससे व्यवस्था में सुधार और मरीजों को बेहतर सेवाएं देने में मदद मिलेगी।
कम लागत, बड़ा बदलाव
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस प्रणाली के लिए किसी महंगे उपकरण की जरूरत नहीं है। यह केवल स्मार्टफोन, क्यूआर कोड और सरकारी क्लोज्ड यूजर ग्रुप (CUG) नेटवर्क के जरिए संचालित होगी। इससे इसे कम लागत में पूरे प्रदेश में लागू किया जा सकेगा।
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि राजस्थान जैसे भौगोलिक रूप से बड़े राज्य में, जहां दूर-दराज के इलाकों से मरीजों को मेडिकल कॉलेज पहुंचने में कई घंटे लग जाते हैं, यह प्रणाली 'गोल्डन ऑवर' के दौरान समय बचाकर गंभीर मरीजों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।